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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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यूनियन में पचास के लगभग सदस्य हो चुके थे। इनमें से अधिकांश फकीरचन्द के साथ किसी-न-किसी भाँति सम्बन्ध रखते थे।
एक दिन एक सदस्य यूसफ कहने लगा, ‘‘इस सभा का कोई प्रधान और कोई मन्त्री बनाया जाये।’’
‘‘क्या आवश्यकता है इसकी?’’ सूर्यकान्त ने कह दिया।
‘‘आवश्यकता की बात तो मैं जानता नहीं। इतनी बात जानता हूँ कि प्रत्येक सभा का एक प्रधान होता है और एक मन्त्री।’’
‘‘इस समय तो मैं इन दोनों कामों को कर रहा हूँ।’’
‘‘पर आप तो श्रमिक हैं नहीं। श्रमिकों की सभा के प्रधान कैसे हो सकते हैं?’’
‘‘मैंने ही इस संगठन को बनाया है, इस कारण जो काम मैं इससे लेना चाहता हूँ, वह मैं ही जानता हूँ। आपमें से कोई न तो इस प्रकार की कमेटियों के काम के विषय में जानता है और न ही उस काम के कराने के ढँग को समझता है।’’
इसपर यूसफ जो फकीरचन्द का इंजिन चलाता था, कहने लगा, ‘‘सूर्य भैया ! तुमको हम निकाल थोड़े ही रहे हैं? आखिर हमको भी तो सब काम सीखना है। तुम हमको बताते रहना।’’
इसपर एक और सदस्य ने कह दिया, ‘‘मैं समझता हूँ कि प्रधान का निर्वाचन तो होना ही चाहिए। यह बात दूसरी है कि हम सूर्य भैया को ही प्रधान बना लें।’’
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