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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘हम निर्वाचन आदि नहीं चाहते।’’ एक और ने कहा।

‘‘तो कोई तो हमारा चौधरी होना चाहिए।’’ शेषराम का कहना था।

‘‘हमारा चौधरी, जिसको हम नेता कहते हैं, सूर्य भैया है।’’

‘‘सूर्य भैया ! मैं चाहता हूँ कि एक दिन निश्चित कर लो और उस दिन निर्वाचन हो जाए और विधिवत् हम तुमको प्रधान बना लें।’’

सूर्यकान्त को सन्देह था कि निर्वाचन हुआ, तो वह प्रधान नहीं बन सकेगा। इससे उसका बना-बनाया काम बिगड़ जाएगा। इस कारण उसने कहा, ‘‘देखो जी ! यह सभा मैंने बनाई है। इस कारण इसका पहले वर्ष के लिए, मैं ही प्रधान रहूँगा। जिसको इसमें रहना है रहे और जिसको नहीं रहना है वह चला जाए।’’

इस प्रकार की बात सुनकर सब एक-दूसरे का मुख देखते रह गए। यूसफ इसका अर्थ समझ गया। उसने समझ लिया कि सूर्यकान्त समझता है कि बहुमत उसके पक्ष में नहीं है। इस बात को समझ उसने खड़े होकर कह दिया, ‘‘देखो जी ! यहाँ पर हम दस से ऊपर यूनियन के सदस्य उपस्थित हैं। हम यह चाहते हैं कि हमारे प्रधान का निर्वाचन किया जाए। इस निर्वाचन के लिए मैं कल सायं-काल आठ बजे का समय निश्तित करता हूँ। सबको इसकी सूचना देने का उत्तरदायित्व मैं लेता हूँ। कल देवगढ़ मजदूर यूनियन के प्रधान तथा मन्त्री का निर्वाचन अवश्य होगा।’’

इसपर सूर्यकान्त ने कहा, ‘‘कल का दिन मुझको अनुकूल नहीं। मैं चाहता हूँ कि यह मीटिंग अभी न की जाए। अभी और सदस्य बनाये जाएँ। तबतक निर्वाचन स्थगित कर दिया जाए।’’

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