|
उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
|
270 पाठक हैं |
बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘कितने दिन के लिए?’’
‘‘एक सप्ताह के लिए’’
‘‘अच्छी बात है। आज रविवार है। अगले रविवार को सायं-काल आठ बजे निर्वाचन होगा।’’
‘‘मैं इस विषय में सूचना भेज दूँगा।’’ सूर्यकान्त ने कहा।
‘‘सुर्यकान्त को इस बात की तकलीफ नहीं करनी चाहिए।
शेषराम ने कह दिया।
‘‘नहीं शेषराम ! मुझको किसी प्रकार का कष्ट नहीं होगा। मैं तो इस काम के लिए ही आया हुआ हूँ।’’
इसपर यूसफ ने पूछ लिया, ‘‘सूर्य भैया ! किस काम के लिए आए हुए हो?’’
‘‘आप लोगों की सेवा करने के लिए।’’
‘‘देखो जी। आप हमारे अतिथि हैं।’’ बृज ने कह दिया, ‘‘इसीलिए यह हमको शोभा नहीं देता कि हम अपने काम के लिए आपको कष्ट दें।’’
इस समय मोतीराम, जो पिछले कमरे में बैठा हुआ था, बाहर आ गया और बोला, ‘‘सूर्य ! मेरे सिर में दर्द हो रहा है। इस चांडाल-चौकड़ी को उठाओ अब। मुझे सोने दो।’’
|
|||||

i 









