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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
इसपर सूर्यकान्त ने सभा विसर्जित कर दी और सब लोग नीचे उतर आए। सब उपस्थित लोग दो गुटों में विभक्त हो गए और पृथक्-पृथक् बातचीत करने लगे। शेषराम के गुट के लोग एक-एक कर खिसक गए और चौधरी रामहरष के यहाँ एकत्रित हो गए। दूसरे गुट में गिरधारी नेता बना हुआ था। वे एक-एक कर पुनः बैठक पर चढ़ गए। वहाँ मोतीराम बैठा सूर्यकान्त से बातचीत कर रहा था।
मोतीराम का कहना था, ‘‘सूर्य भैया ! यह देहात है। यहाँ नगरों की-सी बातें नहीं चल सकतीं।’’
‘‘ठीक है ! परन्तु अब क्या किया जाए?’’
‘‘इस यूनियन को तोड़ दिया जाए और नई यूनियन बना ली जाए।’’ एक सदस्य ने सुझाव उपस्थित कर दिया।
‘‘इससे क्या होगा?’’ सूर्यकान्त का प्रश्न था।
‘‘हम अपने विचारों का प्रचार करते रहेंगे। जब हमारा बहुमत हो जाएगा, तब हम फकीरचन्द के खेतों पर अधिकार कर लेंगे।’’
मोतीराम ने सिर हिलाकर कहा, ‘‘यह बात तो कई बार विचार कर चुका हूँ, परन्तु एक बात तुम नहीं सोचते कि जबतक जमींदार मौजूद है, तब तक फकीरचन्द को हटाने से काम नहीं बनेगा।’’
‘‘तो फिर क्या किया जाए?’’
‘‘मेरी राय तो यह है कि यूनियन बनी रहने दी जाए। अगले रविवार को निर्वाचन हो। तुम लोग सूर्य भैया को प्रधान बनाने का यत्न करो। यदि वह प्रधान बन गया, तब तो हम वह करेंगे, जो करना चाहते हैं और यदि कोई और प्रधान बन गया तो उसको जेल की हवा खिलाना मेरा काम रहा।’’
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