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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘हमने समझा है कि यहाँ तो सब मजदूर एकत्रित हैं। पहले यहाँ से ही काम आरम्भ करना चाहिए।’’
‘‘और यह कहता है कि इसको एक सौ रुपया वेतन मिलना चाहिए।’’ शेषराम ने कहा।
‘‘ओह ! तो इतना इसको कहीं मिलता है?’’
‘‘बताओ गिरधारी !’’ शेषराम ने कह दिया।
‘‘मुझको मोतीराम ने आश्वासन दिया है कि सेठ करोड़ीमल मुझको एक सौ रुपया देगा।’’
‘‘सच ! मुझको यह सुनकर बहुत प्रसन्नता हो रही है कि तुम अब इतने योग्य हो गये हो कि तुम्हारा मूल्य बाजार में एक सौ रुपया हो गया है। गिरधारी ! तुम आज से काम से पृथक् कर दिये गये। मैं तो सौ रुपया दे नहीं सकता। मुझे इस काम के लिए चालीस रुपये में आदमी मिल जाता है। मैं तुम्हारी हानि नहीं करना चाहता।’’
‘‘जाओ, बिहारीलाल से जाकर अपना हिसाब कर लो और कल से तुम सौ रुपये महीने पर सेठ करोड़ीमल की नौकरी कर लेना।’’
इतना कह फकीरचन्द ने बृज को, जो पहले भी कभी-कभी चक्की का काम किया करता था, बुलाकर चक्की पर लगा दिया।
गिरधारी को शेषराम पर क्रोध चढ़ आया और वह शेषराम को यह कहता हुआ कि वह भी इस काम पर नहीं रह सकेगा, चला गया।
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