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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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निर्वाचन के दिन गिरधारी ने यूनियन के सदस्यों को बहुत समझाया कि सूर्यकान्त ने इस यूनियन को बनाया है, इस कारण पहले वर्ष के लिए उसको ही इसका प्रधान बनाना चाहिए; वह बम्बई इत्यादि में यूनियन के काम को सीखकर आया है, इस कारण उससे यूनियन को बहुत लाभ पहुँचेगा। गिरधारी के विरुद्ध यूसफ का कहना था, ‘‘मोतीराम और सूर्यकान्त पहले ही सेठ करोड़ीमल के नौकर था; अब गिरधारी भी सेठ द्वारा एक सौ रुपया महीने पर रख लिया गया है। सेठजी का प्रयोजन है बाबू फकीरचन्द को नुकसान पहुँचाना। हम फकीरचन्द के नौकर हैं। वह हमको अच्छा वेतन देता है। हमारे बाल-बच्चों के लिए स्कूल की फीस देता है, उसको किताबें देता है और उनके लिए दूध का प्रबन्ध किये हुए है। ये लोग हमको फकीरचन्द के विरुद्घ करने के लिए यहाँ प्रचार कर रहे हैं। दो मास से ये फकीरचन्द की निन्दा करते रहे हैं। दूसरे जमींदार तो अपने खेतों पर काम करने वालों को कुछ भी नहीं देते। उनके विरुद्ध सूर्यकान्त ने कभी कुछ नहीं कहा। इसका अर्थ यह हुआ कि हम, जो बाबू फकीरचन्द का दिया खाते हैं, फकीरचन्द की निन्दा और उसको हानि पहुँचाने के लिए सूर्यकान्त को अपना प्रधान बना लें, यह उचित नहीं।
‘‘मेरा तो यह कहना है कि सूर्यकान्त पहले कहीं नौकरी करके देखे। तभी इसको मालूम होगा कि दूसरों के विरुद्ध किस प्रकार बोला जा सकता है।’’
सूर्यकान्त के विरुद्ध शेषराम का नाम प्रधान पद के लिए रखा गया और वह छः वोटों के विरुद्ध पैंतालीस वोटों से प्रधान चुन लिया गया।
चुनाव के समाप्त होते ही मोतीराम ने कहा, ‘‘शेषराम ! अब तुम अपने चेले-चाटों को यहाँ से ले जाओ और उनको लेकर यहाँ नहीं आना।’’
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