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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


सूर्यकान्त यह नहीं चाहता था, परन्तु वह विवश था। जब शेषराम और यूनियन के अन्य सदस्य उठकर जाने लगे तो मोतीराम ने कह दिया, ‘‘गिरधारी को पुनः नौकरी पर लगा देना, नहीं हो बहुत बुरा होगा।’’

‘‘पर भैया ! इसको सेठ की नौकरी नहीं दिलाई क्या? यह तो कहता था कि तुमने इसको सौ रुपये की नौकरी दिलाने को कहा था।’’

‘‘यह तो तभी था जब सूर्यकान्त प्रधान बन जाता।’’

इसपर एक और बोल पड़ा, ‘‘तो हमारे साथ भी जो वचन दिया था, वह ऐसा ही था?’’

‘‘भाई ! यहाँ क्या नौकरियों की खेती होती है? यदि तुम संगठन करते, जैसा हम चाहते थे, तो हम तुम सबका वेतन बढ़वा देते। अब हम क्या कर सकते हैं?’’

इससे तो जिन्होंने सूर्यकान्त को वोट दिया था, वे लोग घबरा उठे। मीटिंग के पश्चात् वे शेषराम के पास जाकर अपनी-अपनी सफाई देने लगे। शेषराम का कहना था, ‘‘तुम काम करते जाओ। बाबू इतना निर्दयी नहीं है कि वह तुम्हें इस मामूली-सी बात के लिए दण्ड दे।’’

‘‘गिरधारी को क्या निकाल दिया है?’’ एक ने पूछ लिया। ‘‘उसकी बात दूसरी है। उसने मेरे सामने कहा था कि उसको सेठ करोड़ीमल एक सौ रुपया महीना वेतन देने को तैयार है।’’

उसी रात को जब यूनियन के सदस्य चौधरी रामहरष के मकान पर एकत्रित हुए, तो उसने उनको समझाया कि मोतीराम तो भला आदमी नहीं है। उससे बचकर रहना चाहिए। साथ ही यदि किसी प्रकार का कष्ट है तो फकीरचन्द को कहकर उसको दूर करने का पूरा-पूरा यत्न किया जायेगा।

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