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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


इस निर्वाचन के पश्चात् देवगढ़ का वातावरण शान्त दिखाई देने लगा था, परन्तु रामहरष के भेदिये यह समाचार ला रहे थे कि मोतीराम कुछ गड़बड़ करने की योजना बना रहा है। इससे उसने फकीरचन्द को कहकर कुछ चौकीदार भिन्न-भिन्न स्थानों पर बिठा दिए। रामहरष, जो गाँव की जनता की मानसिक अवस्था को भली-भाँति समझता था, कह रहा था कि मोतीराम फकीरचन्द की सम्पत्ति को हानि पहुँचाने का यत्न करेगा।

फकीरचन्द ने एक दिन मोतीराम को बुलाकर कहा भी, ‘‘देखो मोतीराम ! मैंने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा परन्तु तुम आरम्भ से ही मेरा विरोध करते चले आये हो। बताओ तो तुम क्या चाहते हो? मैं यथाशक्ति तुम्हारी सहायता करूँगा।’’

मोतीराम ने कहा, ‘‘बाबू ! यह तुमको किसी ने गलत बात कही है कि मैं तुम्हारे विरुद्ध हूँ। मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं। इसपर भी मैं मजदूरों की कमाई तुम्हारी जेब से जाती देख नहीं सकता।’’

‘‘तो तुम ऐसा क्यों नहीं करते कि एक किता भूमि राजासाहब से लेकर, स्वयं मजदूरों की कमाई मजदूरों में ही बाँटकर, एक उदाहरण बना दो। मेरे लिए भी विवशता हो जायेगी कि मैं वही कुछ अपने कर्मचारियों को दूँ, जो तुम दोगे।’’

‘‘मुझको क्या जरूरत पड़ी है जो मैं इतना झँझट मोल लूँ? जब मैं तुम्हें ही न्याय के लिए विवश कर सकता हूँ, तो मुझको एक नया न्यायालय खोलने की क्या आवश्यकता है?’’

‘‘मुझको कैसे विवश करोगे? तुम्हारी यूनियन तो तुम्हारा कहना मानती नहीं।’’

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