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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘मानेगी, कुछ देर और ठहरो। बाबू ! सौ दिन चोर के होते हैं तो एक दिन शाह का भी होता है।’’
फकीरचन्द समझ नहीं सका कि यह चोर, जो स्वयं दो बार चोरी करने पर जेल भोग चुका है, आज कैसे उसको चोर कह रहा है।
मोतीराम तो यह कहकर चला गया; परन्तु वह फकीरचन्द के लिए चिन्ता का विषय छोड़ गया। फकीरचन्द आशंका करने लगा था कि वह कुछ शरारत करेगा। इस कारण उसने चौधरी को कहकर अपने खेतों और चक्की इत्यादि सामान की देख-रेख दुगनी कर दी।
इसका परिणाम यह हुआ कि जब मोतीराम ने वार किया तो पकड़ा गया। कपड़े के कारखाने को आग लगाता हुआ मोतीराम पकड़ा गया। रात के बारह बजे कारखाने के चौकीदारों को कारखाने के समीप किसी के खिसकने का सन्देह हुआ। वे सतर्क हो गये। परन्तु जबतक वे मोतीराम को पकड़ सके, मोतीराम ने सूत के गोदाम में मिट्टी के तेल का जलता हुआ पलीता फेंक दिया था। मोतीराम पकड़ा गया, परन्तु पूर्ण कारखाना जलकर राख हो गया।
पुलिस ने मोतीराम को पकड़ा तो सूर्यकान्त को भी पकड़ दिया। मजदूरों ने बयान दिये। उन्होंने यूनियन का झगड़ा भी बता दिया। उनके बयानों से पुलिस को सन्देह हो गया कि सूर्यकान्त भी आग लगाने के षड्यन्त्र में सम्मिलित है। उसको भी पकड़कर हवालात में डाल दिया गया। मोतीराम को बहुत पीटा गया, परन्तु उसने सिवाय अपने और किसी का नाम नहीं लिया। इस कारण पुलिस सूर्यकान्त को जमानत पर छोड़ने के लिए विवश हो गई।
सूर्यकान्त ने गिरधारीलाल को सन्देश भेजा कि वह उसकी जमानत का प्रबन्ध कर दे। गिरधारीलाल चौधरी के पास पहुँचा और यत्न करने लगा कि वह उसका जामिन बन जाये। चौधरी ने गिरधारीलाल से पूछा, ‘‘पण्डित ! कितने की जमानत देनी होगी?’’
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