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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘पाँच हजार की।’’

‘‘और यदि वह भाग गया तो पाँच हजार कौन देगा?’’

‘‘नहीं, वह भागेगा नहीं।’’

‘‘तुम कैसे जानते हो कि वह भागेगा नही?’’

‘‘वह बहुत भला आदमी है।’’

‘‘इसीलिए वह एक चोर और डाकू के साथ रहता था और उसके कहने के अनुसार फकीरचन्द के काम में विघ्न डालना चाहता था। नहीं गिरधारी ! मैं उसका जामिन नहीं बनूँगा।’’

गिरधारी तीन दिन तक गाँव के प्रत्येक पैसे वाले आदमी से मिलता रहा और यत्न करता रहा कि सूर्यकान्त की जमानत हो जाये, परन्तु कोई भी तैयार नहीं हुआ। वह प्रतिदिन सूर्यकान्त को हवालात में मिलता रहता था और उसको अपने प्रयत्न का विवरण देता रहता था। सूर्यकान्त का कहना था, ‘‘मैं सौगन्धपूर्वक कहता हूँ कि मोतीराम ने यह आग लगाने का काम मुझसे पूछे बिना किया है। यदि वह मुझसे पूछता तो मैं कभी भी उसको यह राय न देता।’’

गिरधारी दिन-भर घूमते रहने से रात को बहुत थक जाता था और जाकर सो जाया करता था। उसको अपनी पत्नी से बातचीत करने का अवसर ही नहीं मिलता था। आज वह सूर्यकान्त को यह कहकर कि जमानत दिलवाने का काम उसके वश का नहीं, घर जल्दी ही आ गया। जब वह आया तो उसकी पत्नी मीना ने कहा, ‘‘लूट लिया है न आनन्द ! मैं कहती न थी कि मोतीराम की संगत में बैठने से दुःख पाओगे। आपकी नौकरी गई, क्योंकि आपको तो सौ रुपये महीने की नौकरी देने का वचन दिया हुआ था। पूरा कर दिया वह वचन मोतीराम ने? मुझको पन्द्रह-बीस रुपये की आय इस कपड़ा बुनने के कारखाने से हो जाती थी, वह कारखाना ही जला दिया मोतीराम ने और अब बच्चे भूखे, बिलख-बिलखकर रो रहे हैं। अब जाओ बम्बई और नौकरी ढूँढ़ों, नहीं तो सबकुछ स्वाहा हो जायेगा।’’

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