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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
गिरधारी की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने भूमि पर बैठकर फकीरचन्द के पाँव पकड़ लिए और क्षमा माँगने लगा, ‘‘मालिक ! क्षमा कर दो, बहुत भारी भूल हुई है। अब क्षमा कर दो।’’
फकीरचन्द ने गिरधारी को हाथ से पकड़कर उठाया और उसको ढाढस बँधाते हुए कहा, ‘‘क्यों, क्या बात है? अरे ! रो रहे हो?’’
गिरधारी की हिचकियाँ बँध गई थीं। फकीरचन्द ने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘अरे, आदमी बनो। बताओ न, क्या बात है?’’
गिरधारी के रोने का शब्द और फकीरचन्द के सान्त्वना के शब्द सुनकर बिहारीलाल भी वहाँ आ पहुँचा। फकीरचन्द की माँ भी कमरे के बाहर आ खड़ी हुई थी। फकीरचन्द ने बिहारीलाल को कहा, ‘‘पीने का पानी मँगवाना, बिहारी !’’
पानी आया, गिरधारी को पिलाया गया। जब उसका चित्त शान्त हुआ तो उसने आग लगने के समय से लेकर तीन दिन की पूर्ण कथा और फिर अपनी पत्नी का कथन सुना दिया। फकीरचन्द उसकी इस भाग-दौड़ और उसके घर की बुरी अवस्था की बात सुनकर भौंचक्का हो उसके देखता रह गया। उसने पूछा, ‘‘गिरधारी ! एक बात पूछूँ? तुम सूर्यकान्त को छुड़ाने के लिए इतने उत्सुक क्यों हो?’’
‘‘बाबू ! वह ब्राह्मण है। उसने मेरे सामने भगवान् की सौगन्ध खाकर कहा था कि आग लगाने की योजना उसकी राय से नहीं हुई। मुझको विश्वास है कि अब वह अपने किये पर पश्चात्ताप कर रहा था। यदि यह आग की घटना न भी होती तो भी वह स्वयं आपके पास आता और आपसे क्षमा माँगता।
‘‘आग लगने के दिन वह चौधरी से मिला था और अपनी, आपके साथ व्यवहार में भूल को स्वीकार करता था। मैं समझता था कि गाँव के लोग, जो आपके प्रतिद्वन्द्वी हैं, वे उसकी जमानत देने के लिए तैयार हो जायेंगे, परन्तु, इस आग लगाने की घटना ने पूर्ण गाँव की सहानुभूति आपके साथ कर दी है। जो लोग आपको, मजदूरों का वेतन बढ़वाने के लिए गाली दिया करते हैं, वे भी आग लगाने वाले की सराहना नहीं कर सके। वे मोतीराम तथा सूर्यकान्त से घृणा करते हैं। सूर्यकान्त मोतीराम का मित्र था और अब सब मुझसे भी घृणा करने लगे हैं क्योंकि मैं सूर्यकान्त के लिए जमानत ढूँढ़ रहा था। परिणाम यह हुआ है कि अब बच्चों के पीने के लिए दूध भी नहीं रहा।’’
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