लोगों की राय

उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

270 पाठक हैं

बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘क्या तुमको विश्वास है कि सूर्यकान्त सच्चे हृदय ले पश्चात्ताप करता था?’’

‘‘बाबू ! मेरी तो यही समझ में आया है। इसी कारण मैं चाहता था कि उसको जमानत पर छुड़ाकर बाहर लाता तो वह आपसे क्षमा माँगता।’’

फकीरचन्द ने अपने कर्मचारियों को यूनियन का चन्दा अपनी जेब से देकर, यूनियन तुड़वाई थी। इसमें बिहारीलाल ने उनको समझाने में भारी भाग लिया था। अब भी वह कोई ऐसी ही बात करना चाहता था। उसने बिहारीलाल की ओर देखकर कहा, ‘‘क्यों बिहारी ! क्या समझे?’’

बिहारीलाल ने भाई के मन में उठ रहे उद्गारों का अनुमान लगाकर कहा, ‘‘भैया ! इसके बच्चों को दूध तो मिलना ही चाहिए।’’

‘‘संतू ! ओ संतू ! !’’ फकीरचन्द ने आवाज दी। उनकी माँ कमरे के बाहर खड़ी गिरधारी की कथा सुन रही थी। उसने घर के भीतर जाकर एक लोटे में दूध भेज दिया। संतू दूध लेकर आया और बोला, ‘‘माँजी ने भेजा है।’’

‘‘गिरधारी ! यह तुम ले लो और यह भी लो।’’ फकीरचन्द ने जेब से पाँच रुपये का नोट निकालकर देते हुए कहा, ‘‘घर जाओ और भोजन-सामग्री खरीदकर काम चलाओ। कल से काम पर आ जाना।’’

गिरधारी चला गया तो फकीरचन्द ने बिहारी को कहा, ‘‘मैं समझता हूँ कि सूर्यकान्त की जमानत देकर, उसको मानव बनने का अवसर दे दूँ। तुम्हारा क्या विचार है?’’

‘‘भैया ! ठीक ही है।’’

‘‘तो चलो चलें।’’ दोनों थाने में जा पहुँचे।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book