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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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फकीरचन्द भोजन कर बाहर चाँदनी में खाट डाले हुए बैठा था। बिहारीलाल सामने टहल रहा था। माँ भीतर सो गई थी। फकीरचन्द विचार कर रहा था कि मोतीराम तो सहायता से दूर हो गया है। वह तो उसकी सहायता कर देता यदि कानून का उल्लंघन किये बिना वह कर सकता। उसने एक बात का निश्चय किया हुआ था। कि अपनी जानकारी में वह कानून नहीं तोड़ेगा। वह देश के कानून को भी धर्म का अँग समझता था।
बिहारीलाल मन में विचार कर रहा था कि भैया कितने उदार हैं। वह अपनी हानि सहन कर भी दूसरे का भला करने में संकोच नहीं करते। क्या यह नीति ठीक है? इस प्रकार की उधेड़-बुन में वह मकान के बाहर लॉन में छिटक रही चाँदनी में टहल रहा था। इस समय सूर्यकान्त फकीरचन्द के सामने आकर खड़ा हो गया। फकीरचन्द ने उसको देखा तो कहा, ‘‘आ गये हो सूर्य?’’
‘‘जी हाँ, आपका बहुत ही आभारी हूँ। मुझको यहाँ की हवालात में भारी कष्ट था और यह कष्ट मुझको व्यर्थ में ही मिल रहा था।’’
‘‘सत्य? यहाँ गाँव में तो यह प्रसिद्घ हो रहा है कि यह तुम्हारी ही योजना थी कि मुझको हानि पहुँचाकर, यहाँ से भगा दिया जाये।
‘‘परन्तु किसी भी गाँव वाले ने मेरे विरुद्ध साक्षी नहीं की।’’
‘‘मैं जानता हूँ। इसपर भी मानता हूँ कि मोतीराम के कार्य का नैतिक उत्तरदायित्व तुम्हारा ही है। तुम पढ़े-लिखे आदमी हो और वह मूर्ख गँवार है। दोनों एक ही काम में लगे हुए थे। मोतीराम का काम भी उसी उद्देश्य की पूर्ति में हुआ है, जिसमें तुम दोनों संलग्न थे। इस सब बात को जानकर कौन कह सकता है कि तुम उसके काम के लिए उत्तरदायी नहीं?’’
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