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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
सूर्यकान्त इस प्रकार की बात सुनकर चकित रह गया। उसने बहुत देर तक विचार करने के बाद पूछा, ‘‘आप मुझको क्या करने को कहेंगे?’’
‘‘कुछ दिन तक आराम करो। अपने मन में विचार करो। नेकी और बुराई में भेद समझने का यत्न करो और अपने मन के आदेशानुसार काम करो।’’
‘‘बस?’’
‘‘इससे अधिक मैं क्या कह सकता हूँ?’’
‘‘आज इस गाँव में मेरे रहने के लिए स्थान नहीं। जब तक मोतीराम के मुकद्दमे का फैसला नहीं हो जाता, मैं यही रहना चाहता हूँ। आप इसमें मेरी क्या सहायता कर सकते हैं?’’
‘अभी तो तुमको यहाँ खाट डलवा देता हूँ। आगे के लिए सुबह विचार कर लेंगे। भोजन किया है अथवा नहीं?’’
‘‘भोजन कर लिया है।’’
फकीरचन्द ने संतू को कहकर वहाँ एक ओर खाट डलवा दी। उसपर बिस्तर बिछवा दिया और सूर्यकान्त को सोने के लिए धोती-कुरता मँगवाकर दे दिया।
अगले दिन सूर्यकान्त अभी सो ही रहा था कि फकीरचन्द प्रातः की नित्य-क्रिया से निवृत्त होकर खेतों में काम पर चला गया। सूर्यकान्त को दस दिन के पश्चात् इस प्रकार खुले में सोने का अवसर मिला था। इस कारण वह सोया तो उसकी नींद दिन के आठ बजे ही खुल सकी।
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