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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


बिहारीलाल, फकीरचन्द के आदेशानुसार चौधरी रामहरष को बुलाकर, सूर्यकान्त के गाँव में ठहरने का प्रबन्ध कर रहा था। सूर्यकान्त उठा तो बिहारीलाल और रामहरष उसके पास आकर, अपने प्रबन्ध के विषय में बताने लगे।

चौधरी ने कहा, ‘‘सूर्य भैया ! बाबू ने कहा है कि तुम्हारी इच्छा अभी गाँव में रहने की है और मोतीराम के मकान को पुलिस ने सील किया हुआ है। इस कारण तुम्हारे लिए एक मकान का चुनाव हमने कर लिया है। वह मेरे मकान के सामने है। सो यदि तुम चाहो तो चल सकते हो।’’

सूर्यकान्त फकीरचन्द की ओर से, इस सतर्कता से प्रबन्ध होता देख चकित था। उसने कहा, ‘‘चौधरी ! फकीरचन्द बाबू कहाँ है?’’

‘‘वह इस समय खेतों में है।’’

बिहारीलाल ने स्नानादि तथा अल्पाहार का प्रबन्ध कर दिया। इसके पश्चात् सूर्यकान्त फकीरचन्द को खेतों में जा मिला। फकीरचन्द गन्ने के खेतों का निरीक्षण कर, पम्प की ओर आ रहा था, जब सूर्यकान्त उसके पास आया। फकीरचन्द ने बताया, ‘‘मैंने तुम्हारे लिए मकान का प्रबन्ध कर दिया है।’’

‘‘मुझको चौधरी ने बताया है, परन्तु मकान मात्र से तो काम चल नहीं सकता। मैं यह अपना कर्तव्य समझता हूँ कि मोतीराम का झगड़ा समाप्त होने तक देवगढ़ में रहूँ। परन्तु यहाँ रहने के लिए मेरे पास तो साधन भी नहीं। मैं यह कहने आया था कि यदि आप मुझको कोई काम दें, तो मैं अपने निर्वाह के लिए पैदा कर सकूँगा।’’

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