|
उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
|
270 पाठक हैं |
बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘देखो सूर्यकान्त ! तुम जहाँ चाहो जा सकते हो। मेरे पास तो तुम्हारा पता होना चाहिए, जिससे जब भी पुलिस को तुम्हारी आवश्यकता पड़े, मैं तुमको हाजिर कर सकूँ। इसलिए, केवल मेरी जमानत के कारण तुमको यहाँ पड़े रहने की आवश्यकता नहीं। हाँ, इसके अतिरिक्त यदि तुम यहाँ कोई काम कर, अपनी जीविका-उपार्जन करना चाहते हो तो उस विषय पर विचार किया जा सकता है।’’
‘‘यह तो मैं रात ही समझ गया था। आप जब मेरी जमानत देकर, मुझको हवालात से निकलते देखने भी नहीं आये, तो मैं समझ गया था कि आपने एक काम ठीक समझ कर दिया है और शेष मेरे ऊपर छोड़ दिया है। इस अवस्था में यह मेरा कर्तव्य हो गया है कि मैं यही रहूँ। इसमें कठिनाई का मैंने वर्णन कर दिया है। इसके यह अर्थ नहीं कि मेरे पालन-पोषण का भार आपको वहन करना चाहिए। आप किसी प्रकार भी यह प्रबन्ध करने के लिए बाध्य नहीं है। मैं अपनी इच्छा से यहाँ रहना चाहता हूँ और निर्वाह के लिए कुछ उपयोगी कार्य करना चाहता हूँ। इसमें ही आपसे सहायता माँग रहा हूँ।’’
‘‘इसके विषय में कुछ विचार करना पड़ेगा। साथ ही तुम भी सोचो कि तुम क्या काम कर सकते हो। तुम्हारा जो पहला कार्य था, उसके विषय में अब क्या विचार है?’’
‘‘मैं जब अभी बालक ही था, तब से ही मेरे मन में यह भावना थी कि मैं मजदूरों की सेवा करूँगा। मैं स्वयं भी एक मजदूर का बेटा हूँ। मुझको स्मरण है कि मेरे पिता धनाभाव के कारण हस्पताल की दवाई खाते-खाते मरे थे। मेरी माँ का देहान्त मेरे होश सँभालने से पहले ही हो चुका था। मेरा पालन-पोषण भी एक मजदूर के घर में हुआ। मुझको मैट्रिक तक पढ़ने के लिए भीख माँगनी पड़ी है और फिर पास करने के बाद, जब महीनों तक दर-दर की ठोकरें खाने के बाद भी काम नहीं मिला, तो मैं मजदूरों के संगठन मे लग गया। इसी काम में मैं दो बार जेल काट चुका हूँ। अब तीसरी बार जाता-जाता बचा हूँ। अभी कह नहीं सकता कि मोतीराम क्या गुल खिलायेगा। जब उसका मुकद्दमा समाप्त हो जायेगा और उसको दण्ड मिल चुकेगा, तभी मैं निश्चिन्त हो सकूँगा कि मैं बच गया हूँ।’’
|
|||||

i 









