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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘क्या तुम समझते हो कि तुमने कोई ऐसा खराबी की है, जिससे तुमको दण्ड हो सकता है?’’
‘‘इस स्थान पर तो एक ही बात की है। सेठ करोड़ीमल का धन खाया है और उसके षड्यन्त्र में, कि तुम्हारा सर्वनाश करना चाहिए, सम्मिलित हुआ हूँ। मैं समझता था कि मैं एक धनी आदमी की सहायता से दूसरे धनी का सर्वनाश कर रहा हूँ। इस प्रकार गरीबों का खून चूसनेवालों में से एक की संख्या कम कर रहा हूँ।
‘‘हवालात मे बैठे हुए विचार करने पर मेरी समझ में आया है कि मैंने सेठ का विदोहन नहीं किया, प्रत्युत उसने मेरा विदोहन किया है। उसने मुझको अपने घृणित कार्य में सहायक बना लिया था।
‘‘यहाँ तो मैं देखता हूँ कि मैं किसी प्रकार से भी, किसी उत्पादन-कार्य में सहायक नहीं हो सकता। इस कारण मैं क्या करूँ और कैसे जिऊँ, यह एक समस्या हो गई है।’’
फकीरचन्द सूर्यकान्त की समस्या को विचार कर ही उससे काम ले सकता था। साथ ही वह समझता था कि जब वह मुकद्दमे तक वहाँ स्वयं ही रहना चाहता है, तो उसको इसमें सहायता देनी चाहिए। इस प्रकार विचारकर उसने कहा, ‘‘मनुष्य काम करने से डरता अथवा संकोच न करता हो, तो हर एक के लिए काम ढूँढ़ा जा सकता है। इस कारण मेरा विचार है कि अभी तो तुम बिहारीलाल के साथ रहा करो। वह यहाँ पर ऐसे कामों की जाँच-पड़ताल में लगा हुआ है, जो एक किसान को खाली समय में लाभ दे सकते हैं। तुम उसकी सहायता करो और यदि काम तुमको रुचिकर सिद्ध हुआ, तो बिहारीलाल के पढ़ाई के लिए चले जाने पर, तुम उसके काम को जारी रख सकोगे।’’
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