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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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बिहारीलाल को, सूर्यकान्त से काम लेने के लिए उसको अपनी अर्थनीति समझानी आवश्यक हो गई। पहले ही दिन जब सूर्यकान्त बिहारीलाल समझानी आवश्यक हो गई। पहले ही दिन जब सूर्यकान्त बिहारीलाल के पास बात समझने के लिए पहुँचा तो इस विषय पर बात होने लगी कि कितना भाग मजदूर का होना चाहिए और कितना पैसा लगाने वाले का। काम, जिसके विषय में बिहारीलाल जाँच-पड़ताल कर रहा था, छपाई का था। स्त्रियों की साड़ियों, कुर्तियों और लहँगों के लिए कपड़े पर सुन्दर बेल-बूटे छापने का काम था। बिहारीलाल का अनुमान था कि किसान के परिवार के लोग रिक्त समय में यह काम कर अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं। इसी के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए और इस प्रकार रुपये की लागत का अनुमान लगाने के लिए तथा इससे प्रति घण्टा काम कर कितना पैदा किया जा सकता है, इसके हिसाब लगाने के लिए, बिहारीलाल काम कर रहा था। उसने कपड़ा, रंग, छापे और मजदूरी का अनुमान लगा लिया था वह इस प्रकार के माल के लिए मण्डी, लागत और बिक्री की दर भी पता कर चुका था।
सूर्यकान्त आया तो बिहारीलाल ने उसको समझाया, ‘‘देखो भैया सूर्यकान्त ! हमने यह छपाई का काम यहाँ पर चलाकर, उन किसानों के लिए आय का साधन बनाना है, जो मेहनत के लिए तैयार हैं।
‘‘इस काम पर पाँच हजार व्यय होने का अनुमान है। इतना रुपया व्यय कर हम चालीस आदमियों के, दस घण्टा नित्य काम करने का प्रबन्ध कर सकेंगे। ये लोग लगभग पाँच हजार रुपये का, महीने में छपाई का काम कर सकेंगे। मेरा अभिप्राय यह है कि यदि चालीस-के-चालीस अड्डे दस घण्टे कामकरते रहें, तो इतने मूल्य का काम हो सकेगा। इसपर व्यय बैठेगा तीन हजार आठ सौ रुपया और बचत होगी एक हजार दो सौ रुपया।
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