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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘अब इसमें होगा यह कि अब अड्डे दस घण्टे चालू नहीं रहेंगे। मेरा अनुमान है कि जब काम जोर से होगा, तब भी तीस अड्डों से अधिक कभी भी चालू नहीं रहेंगे, अर्थात् आय रह जायगी आठ सौ रुपया।
‘‘यदि यह काम पूरा वर्ष-भर चालू रहे, तो लगभग नौ हजार रुपये की आय होगी।’’
सूर्यकान्त ने कहा, ‘‘यह आय तो बहुत अधिक है। मैं समझता हूँ कि काम करने वालों को अधिक मजदूरी देनी चाहिए।’’
‘‘यह भी दी जा सकती है, परन्तु इसलिए नहीं कि इस प्रकार के काम में नौ हजार रुपये की आय बहुत अधिक है। नौ हजार का मतलब है, इस अड्डे का प्रबन्ध करने पर लगभग एक आना नित्य का, इस सब काम के संगठनकर्त्ता को मिलेगा। उस संगठनकर्त्ता को इसमें से सरकार के टैक्स और लोक-कल्याण के काम भी करने होंगे।
‘‘प्रति अड्डा एक आना नित्य उजरत अधिक कही जा सकती है। परन्तु इस एक आना प्रति अड्डा बचा लेने से कितने ही नये काम खुल सकते हैं और फिर कितने ही और अधिक आदमियों के लिए रोजगार का प्रबन्ध किया जा सकता है। देखो भैया सूर्यकान्त ! जब हम यहाँ आये थे, तो हमने केवल तीन लकड़हारे नौकर रखे थे। अब हमारे कामों पर पचास से ऊपर आदमी काम कर रहे हैं। इस कपड़े के कारखाने में चार तो वेतनधारी काम करते थे और पचास के लगभग लोग यहाँ काम कर, अपनी आय में उन्नति कर रहे थे। इसी प्रकार जब यह काम खुलेगा तो चार आदमी वेतनधारी होंगे और चालीस से ऊपर आदमी इसके आश्रय जीविका पैदा करेंगे। यह सब-कुछ उस एक आने की बदौलत ही तो है, जो इन कामों का संगठनकर्त्ता प्रति आदमी प्रति दिन निकाल लेता है। उससे जानते हो और क्या लाभ हो रहा है गाँव वालों को? हमारे मजदूरों के बच्चों को स्कूल की फीस नहीं देनी पड़ती। सबको स्कूल में दूध पीने को मिलता है। वर्ष में दो बार नये कपड़े भी मिल जाते हैं। इसके अतिरिक्त बीस योग्यता के वजीफे स्कूल के विद्यार्थियों को मिलते हैं।’’
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