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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
इस लम्बे-चौड़े वक्तव्य को सुनकर सूर्यकान्त ने वही बात, जो उसने अपने साथियों से सीखी हुई थी, कह दी, ‘‘यह सब काम तो सरकार के हैं–बच्चों को दूध देना, कपड़े पहिनाना, फीस माफ कर देना और वजीफे देना। आपको तो उजरत पूरी देनी चाहिए और ये काम सरकार के लिए छोड़ देने चाहिएँ?’’
‘‘तो तुम समझते हो कि सरकार के घर रुपयों की खेती होती है, जो वह ये सब काम बिना मजदूरों से कुछ भी लिए कर देगी? नहीं भैया सूर्य ! सरकार यह काम कर सकेगी अथवा नहीं, मैं नहीं जानता। मैं तो यह जानता हूँ कि यदि सरकार इन सब कल्याण के कामों को करने लगेगी तो उसको भी रुपये की आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए जनता पर कर लगायेगी। उस कर को इकट्ठा करने के लिए बड़े-बड़े अधिकारी नियुक्त करेगी। वे हजारों रुपये वेतन लेंगे और फिर घूस भी खा सकते हैं। हम कर तो देंगे परन्तु हमारे ही काम वह रुपया आएगा, यह कहना कठिन है।
‘‘भैया फकीरचन्द इस सब काम के संगठनकर्त्ता हैं। अतः वे सब संगठन-कार्य का मूल्य लेते हैं, मान लो, सरकार इस पूर्ण संगठन को अपने हाथों में लेती है, तो वह भैया के स्थान पर एक भारी वेतनधारी प्रबन्धक रखेगी और वह प्रबन्धक यदि गन्ना बोएगा, तो मुर्गियों का काम नहीं करेगा। जो पोल्ट्री का काम करेगा, वह चक्की का नहीं करेगा। इसी प्रकार चक्की का काम करने वाला आरे का काम नहीं करेगा। परिणाम जानते हो, क्या होगा? इस काम के लिए, जिसको भैया अकेले कर रहे हैं, अधिकारियों के एक दल की आवश्यकता पड़ जाएगी। मजदूरों को तो जो मिलेगा, वह कहना कठिन है; हाँ, ये अधिकारी लोग गुल-छर्रे जरूर उड़ायेंगे।’’
‘‘यह ठीक है।’’ सूर्यकान्त ने बिहारीलाल की युक्ति को मानते हुए कहा, ‘‘परन्तु सरकार इन बड़े-बड़े अफसरों का वेतन देने के लिए कर लेगी तो धनियों से ही लेगी। इस प्रकार निर्धनों का संगठन करने के लिए यदि धनियों पर कर लगता है, तो हानि ही क्या है?’’
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