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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
आज बिहारीलाल ने उसको एक बहुत ही सरल पाठ पढ़ाया था। उसने कहा था कि सरकार यदि किसी की सहायता करेगी, तो वह उस सहायता को तभी कर सकेगी, जब वह उसके लिए धन मजदूरों के वेतन में से काटेंगी। यही तो एक मालिक करता है। जैसे एक मालिक अपने पास बचे धन को अपनी इच्छानुसार व्यय करता है, वैसे ही सरकार धन को उनमें बाँटेंगी, जो सरकार को स्थिर रखने के लिए नेताओं की सहायता करेंगे। वह मन में विचार करता था कि एक मजदूर की मजदूरी तो उसी तरह से हजम हो जाएगी, जैसे एक मालिक के होने पर होती है। तो एक सरल-चित्त व्यक्ति के भाग्य में परिवर्तन कैसे सम्भव है?
बिहारीलाल ने सूर्यकान्त के मन में उठ रहे संशयों को सुनकर कहा, ‘‘भैया सूर्य ! इस सब समस्या का सुझाव यह है कि मालिक बनने का यत्न करो। राज्य के हाथ में सबकुछ दे देने से तो स्वयं मालिक बनोगे नहीं, साथ ही पूर्ण जाति को नौकरों की पदवी दिलवा दोगे।’’
‘‘पर सब तो मालिक बन नहीं सकते?’’
‘‘हाँ, यह इसी प्रकार है, जैसे सब नेता नहीं बन सकते। प्रश्न तो यह है कि नेता मालिक हो अथवा वह मालिक और मजदूर दोनों के ऊपर नियन्त्रण रखने वाला हो। जब नेता ही मालिक हो गए, तो स्मरण रखो फिर अन्याय को रोकने की क्षमता किसी में नहीं होगी।’’
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