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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।

पंचम परिच्छेद

1

सूसन के लड़का हुआ। शकुन्तला इत्यादि उसको मिलने के लिए आती रहीं। सूसन से मिलने के लिए शकुन्तला उसको टेलीफोन कर लेती और जब उसको पता चल जाता कि सुन्दरलाल घर पर नहीं है, तो वह उससे मिलने चली जाती। सूसन का लड़का गौर-वर्णीय था। गोलमटोल, बहुत ही भोला प्रतीत होता था। शकुन्तला के अपने बच्चे भी अच्छे हष्ट-पुष्ट थे, परन्तु दोनों काले रंग के थे। बड़ा लड़का था, जो अब स्कूल में पढ़ने जाता था और छोटी लड़की थी।

सूसन के लड़के को देख शकुन्तला के मन में ईर्ष्या होती थी, परन्तु वह अपने मन को नियन्त्रण में रख सन्तोष कर लिया करती थी। एक बात की उसको प्रसन्नता थी कि सूसन अभी तक बिना अभिमान प्रकट किये उससे मिलती थी। वह उससे बहुत ही स्नेहमय व्यवहार रखती थी।

सूसन को मिलने और बधाई देने सुन्दरलाल के परिचित तथा मित्र आते रहते थे। इनमें एक वकील सोमनाथ भी था। वह सूसन से बहुत हिल-मिल रहा था। सुन्दरलाल जैसे बिहारीलाल से ईर्ष्या करने लगा था, वैसे ही वह सोमनाथ का सूसन से अधिक मेलजोल पसन्द नहीं करता था। इस प्रकार के सन्देह से सूसन खिन्न रहती थी। जहाँ तक शकुन्तला का सम्बन्ध था, सुन्दरलाल को उसका वहाँ आना-जाना विदित नहीं था।

सोमनाथ वकील होने के नाते, भगेरिया परिवार की बहुत-सी बातें जानता था और वह सूसन को बताया करता था। एक दिन वह आया तो सुन्दरलाल के पिता के व्यवहार की बात करने लगा, उसने कहा, ‘‘आज मिस्टर के० भगेरिया को व्यापार में बीस लाख की हानि हुई है।’’

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