लोगों की राय

उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

270 पाठक हैं

बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘बीस लाख की !’’ सूसन ने विस्मय में पूछा, ‘‘यह कैसे हो सकता है?’’

‘‘मिस्टर के० इसी प्रकार बने थे और ऐसा प्रतीत होता है कि इसी प्रकार दिवालिया हो जायेंगे।’’

‘‘क्या मतलब?’’ सूसन ने चिन्ता में मुख लम्बा कर पूछा।

‘‘मतलब यह है कि सन् १९१९ में सोने का भाव गिरने लगा तो मिस्टर के० सोना बेचने लगे। भगवान् की कृपा हुई कि एक सप्ताह में वे दो करोड़ रुपये के मालिक हो गये। उस समय इन्होंने कपड़े के दो कारखाने खरीद लिये। सन् १९२१ और २२ में महात्मा गांधीजी का आन्दोलन चल पड़ा। देसी कपड़े वालों के पौबारह होने लगे। बस फिर क्या था, दो के चार कारखाने हो गये।

‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि अब गाड़ी अपने आरम्भ के स्टेशन पर लौट रही है। इस वर्ष बड़े भगेरिया को एक करोड़ रुपये की हानि हो चुकी है।’’

‘‘मिस्टर सोम ! आप यह सब कैसे जानते हैं?’’

‘‘मैं वकील हूँ और सट्टा बाजार में जो कुछ होता है, मुझको मालूम रहता है। प्रायः दिवाला निकालने वाले सेठ मेरे पास ही आते हैं और मैं उनको सम्पत्ति छिपाकर बचाने की तरकीब बताया करता हूँ।’’

सूसन को यह सब, व्यापार के हेर-फेर का पता नहीं था। इस कारण उस रात जब सुन्दरलाल आया तो उसने उसके पिता के व्यापार की बात चला दी। उसने पूछा, ‘‘आप और आपके पिता क्या व्यापार करते हैं?’’

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book