|
उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
|
270 पाठक हैं |
बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘क्यों?’’ सुन्दरलाल ने सतर्क होकर पूछा।
‘‘सुना है आपके पिता को भारी हानि हो रही है !’’
‘‘किससे सुना है?’’
‘‘आपके मित्र मि० सोम से। वह आज आये थे और बातों-ही-बातों में बता गये कि पिताजी को एक करोड़ रुपये की हानि हो चुकी है।’’
‘‘यह सोम का बच्चा यहाँ क्या करने आया था?’’
‘‘वह कभी-कभी यहाँ चाय पीने आ जाया करता है। बहुत ही भला और सभ्य स्वभाव का व्यक्ति है। उसको बातें करने का ढँग आता है। जब आता है तो दिल बहला रहता है।’’
‘‘देखो सूसन ! इस आदमी को बहुत मुँह नहीं लगाना चाहिए। वह पक्का चार सौ बीस है। लोगों को झूठे हिसाब बनाने में राय दे-देकर, अपनी जीविका चलाता है।’’
‘‘बहुत खराब आदमी है ! मुझको तो विस्मय इस बात का है कि ऐसे आदमी का, आपने मेरे साथ परिचय क्यों कराया?’’
‘‘मुन्ने के नामकरण के दिन तो बहुत से लोग आये थे। उनमें अच्छे भी थे और बुरे भी। इस प्रकार सोमनाथ भी आ गया। यह बहुत ही दुष्ट है। तुमसे तो मित्रता ही कर बैठा है।’’
‘‘पर आप तो बिहारीलाल के विषय में भी यही कहते थे। वह न तो वकील था और नही किसी प्रकार से दुष्ट।’’
‘‘तो वह भी तुमसे मिलता रहता है क्या?’’
|
|||||

i 









