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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।

2

सूसन को, सोमनाथ के इतने भयानक आदमी सिद्ध होने पर, भारी क्रोध चढ़ आया। इसपर भी वह समझ न सकी कि क्या किया जा सकता है। इस स्थिति में उसने एक चौकीदार नौकर रखने का निश्चय कर लिया। उसने यह भी विचार किया कि वह किसी से बिना पूर्व निश्चय के भेंट नहीं किया करेगी।

परन्तु वह यह नहीं जान सकी थी कि उसके निज के विषय में कोई क्यों जानने का यत्न कर रहा है। उसका सन्देह सुन्दरलाल के पिता पर ही जाता था। परन्तु यह सोमनाथ तो कुन्दनलाल को गालियाँ दिया करता था। इससे उसको विश्वास हो गया कि यह कुन्दनलाल के अतिरिक्त कोई अन्य व्यक्ति ही हो सकता है। पर वह कौन हो सकता है, उसकी समझ में नहीं आ रहा था।

इससे वह अति खिन्न मन कपड़े पहन घर से निकल गई। वह मन में सोमनाथ के व्यवहार पर विचार करती हुई, बिना किसी लक्ष्य स्थान का विचार किये, घर में निकली तो मैरीन ड्राइव पर से होती हुई मालाबार हिल की ओर जाने लगी। एक घंटा भर पैदल चलती हुई वह कुछ थकी-सी अनुभव करने लगी थी। इस कारण घर की तरफ लौट पड़ी। इस सब समय वह विचार करती रही थी कि उसके पति का सट्टा खेलना और उसके श्वसुर का दिवाला पिट जाना, भला उसके जीवन पर क्या प्रभाव डाल सकते हैं? उसको प्रत्यक्ष रूप में इसके साथ अपना किसी प्रकार का भी सम्बन्ध प्रतीत नहीं होता था। इतना वह जानती थी कि उसके पास अपनी एक सम्पत्ति है। यदि उसका पति कभी बहुत हानि भी उठायेगा, तो उसको निराश होने का कोई कारण नहीं। उसके पास जीवन-निर्वाह के लिए पर्याप्त होगा।

इसपर भी वह सोचती थी कि यदि सट्टा जुआ ही है तो ऐसा व्यापार करने से लाभ ही क्या है?

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