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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘मैं इस बात को जानने का यत्न कर रहा हूँ कि आपका और भगेरियाजी का क्या सम्बन्ध है? यों तो आप यहाँ पर पति-पत्नी के रूप में रहते हैं, परन्तु आपका विवाह नहीं हुआ। इस कारण आप कानून से भगेरियाजी की पत्नी नहीं है, तो क्या है? मुझे पता चल गया है कि आप मि० सुन्दरलाल की साढ़े छः लाख रुपये में खरीदी हुई रखैल हैं। कानून से आप वेश्या है।’’
‘‘ठीक है। अब यह जानकर आप क्या करना चाहते हैं?’’
‘‘मैंने इस विषय में सब प्रमाण एकत्रित कर लिए हैं। आपसे उनका समर्थन चाहता था। आपने समर्थन मौखिक तो कर दिया है। यदि यह प्रमाण लिखित मिल जाये तो मेरा काम समाप्त हो जायेगा।’’
‘‘अच्छी बात है। आप नीचे उतर जाइये नहीं तो मुझको पुलिस बुलानी पड़ेगी।’’
‘‘देखो मैडम ! घबराने और क्रोध करने की आवश्यकता नही। मैं अपने ज्ञान का आपके विरुद्ध प्रयोग नहीं कर रहा। इस ज्ञान को कोई खरीद रहा है और वह इसके लिए मुझको एक भारी राशि दे रहा है।’’
‘‘अभी इसी क्षण चले जाइये, अन्यथा ठीक नहीं होगा।’’
‘‘आप रुष्ट हो गईं? मैं तो समझता था कि आपको कम-से-कम इतना तो जानने की इच्छा रखनी ही चाहिए कि वह कौन व्यक्ति है, जो आपके इस रहस्य को जानने के लिए उत्सुक है। भला बूझिये कि वह कौन हो सकता है?’’
इस समय सूसन को बहुत ही क्रोध चढ़ आया। उसने उठकर टेलीफोन का चोंगा उठाया, तो सोमनाथ भी खड़ा हो गया। उसने सीढ़ियों की ओर जाते हुए कहा, ‘‘कोई आवश्यकता नहीं, टेलीफोन करने की। मैं जा रहा हूँ। अच्छा, नमस्ते, फिर मिलेंगे।’’
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