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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘हाँ, हमारे गाँव में एक व्रयुटर कैट्ट था। वह एक दिन हारने लगा तो दस हजार लूइस एकदम हार गया। तत्पश्चात् अपना कर्जा न दे सकने के कारण उसने अपने को गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी।’’
‘‘यही बात सटोरियों की है। सट्टा भी एक प्रकार का जुआ है। ज्यों-ज्यों एक आदमी उसमें हानि उठाता है, त्यों-त्यों वह और बड़े दाँव लगाता जाता है। पिताजी की भी यही हालत हो रही है।’’
सूसन इस मीमांसा से चकित रह गई। उसने कहा, ‘‘मैं समझती हूँ कि आप जैसे समझदार व्यक्ति को तो इस प्रकार का व्यापार नहीं करना चाहिए।’’
‘‘मैं समझता हूँ कि मेरे जैसे समझदार व्यक्ति को ही तो इस प्रकार का व्यापार करना चाहिए। मैं अपने मन पर पूरा काबू रखता हूँ। जब हारने का समय आता है तो मैं क्रय-विक्रय बन्द कर देता हूँ।’’
‘‘मैं समझती हूँ कि यह व्यापार नहीं है। यह तो जुआ है। ऐसा करना उचित नहीं।’’
‘‘तो फिर क्या करूँ? बेकार तो मैं बैठ नहीं सकता।’’
मैं क्या करूँ के प्रश्न ने सूसन के मन में हलचल मचा दी। अगले दिन सोमनाथ आया तो सूसन ने कह दिया, ‘‘मैं समझती हूँ कि आपको बिना किसी काम के यहाँ नहीं आना चाहिए।’’
‘‘मैंडम ! आप क्या समझती हैं कि मैं बिना काम के यहाँ आता हूँ? नहीं, यह बात नहीं। मेरा कुछ काम है। उसके सम्बन्ध में ही मैं यहाँ आया करता हूँ। मैं अपना काम कर रहा हूँ।’’
‘‘मैं नहीं समझी। आपको यहाँ क्या काम है?’’
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