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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘जिनसे मानव समाज के प्रयोग की किसी वस्तु का निर्माण हो।’’

‘‘इसका मतलब है कि कपड़े की मिल खोलना निर्माणात्मक कार्य है।’

‘‘हाँ; और सट्टे का व्यापार परिकल्पी है। इसी प्रकार जुआ खेलना है।’’

‘‘इसका अर्थ तो यह हुआ कि संसार में अधिकांश कार्य निर्माणात्मक ही हैं। परिकल्पी काम तो बहुत ही कम है?’’

‘‘हाँ, परन्तु मनुष्य प्रायः निर्माणात्मक कामों के साथ-साथ परिकल्पी काम भी मिला देता है जिससे दोनों में भेदभाव करना अति कठिन हो जाता है। उदाहरण के रूप में कपड़े का काम ही ले लो। वह स्वयं तो निर्माणात्मक ही है, परन्तु कपड़े के व्यापारी गर्मी की ऋतु में कपड़े खरीदकर रख लेते हैं और दीवाली के समय अथवा शरद् ऋतु के समय बेचते हैं। दोनों समय माँग में अन्तर होने के कारण भाव में अन्तर हो जाता है और इस प्रकार केवल-मात्र रुपया लगाने से लाभ कर लेते हैं। कार्य का यह अंश तो परिकल्पी ही है। इसी प्रकार अन्य कामों में भी होता है। इससे मानव समाज को हानि भी होती है। सबसे बड़ी हानि यह है कि ऐसा करने वालों के स्वभाव बिगड़ जाते हैं।’’

‘‘क्या वह व्यक्ति, जो परिकल्पी काम करता है, स्वभाव से भी बिगड़ जाता है?’’

‘‘ऐसे आदमी के स्वभाव का बिगड़ना अनिवार्य है। इस प्रकार के कामों में झूठ, चोरी, लुकाव-छिपाव, धोखा-धड़ी होना निश्चित है। बार-बार ऐसा करने वालों के स्वभाव में अन्तर पड़ना भी निश्चित ही है। इसके अतिरिक्त इस प्रकार के काम से लोक-कल्याण की कोई बात बनती नहीं। जो बिना किसी प्रकार का निर्माण कार्य किये अर्थात् दूसरों की आवश्यकता के पूरा करने में भाग लिए, अन्न खाता है, उसका अन्न विष रूप हो जाता है। इसी से तो गीता में जीवन को यज्ञ रूप बनाने के लिए कहा है और अपने भाग के लिए यज्ञ को हविमात्र ही प्रयोग करने को लिखा है।’’

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