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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
सूसन के लिए यह जीवन-मीमांसा सर्वथा नवीन थी। वह इसका अर्थ समझने में विचारमग्न थी कि बिहारीलाल ने अपने कथन को और स्पष्ट करने के लिए कह दिया, ‘‘सट्टे के काम को तथा और इसी प्रकार के कामों को हम साधारण भाषा में हेरा-फेरी कहते हैं। इसमें निर्माणात्मक काम तो कुछ होता नहीं। हाँ, भाव-ताव कर और अन्य लोगों की आवश्यकताओं का लाभ उठाकर, अपना लाभ बना लिया जाता है। इसको तस्कर व्यापार भी कहा जा सकता है।’’
‘‘तो आपका मतलब है कि सेठ करोड़ीमल तथा सेठ कुन्दनलाल अथवा आपके जीजा केवल हेरा-फेरी कर रहे हैं, इसी कारण उनके विचार करने का ढँग हमसे भिन्न है?’’
‘‘हाँ; जैसा अन्न खाया जाता है, वैसा ही शरीर तथा मन बनता है। अन्न अच्छा अथवा बुरा, उसमें उपयोगी तथा अनुपयोगी पदार्थों पर निर्भर तो करता है, साथ ही वह अन्न कैसे प्राप्त किया जाता है, यह भी अन्न को अच्छा अथवा बुरा बनाता है। मैं तो ऐसा ही समझता हूँ।
‘‘देखो, हमारे गाँव में एक समाजवादी आ पहुँचे थे। उनका विचार था कि भाई साहब अपने कर्मचारियों को लूट रहे हैं। उनसे दिन में नौ घण्टे काम लेते हैं और उनको बहुत ही मामूली-सा वेतन देकर स्वयं मालमाल हो रहे हैं। परन्तु जब उनका वास्तविकता से वास्ता पड़ा, तो वे समझ गये कि भाई साहब का काम निर्माणात्मक है और उनके काम को करने वाले संसार में बहुत ही कम संख्या में हैं। यदि भाई साहब उस काम से निकल जायें, तो मजदूरों की मेहनत का मूल्य कुछ भी नहीं रह जाता। निर्माणात्मक कामों में निर्माण कार्य को जानने वाला व्यक्ति सदा मुख्य होता है; परन्तु जहाँ काम केवल परिकल्पी हो, यहाँ कार्य के जानने और न जानने का प्रश्न ही नहीं रह जाता। प्रत्येक बात और उसका परिणाम एक घटनामात्र ही होता है। इस कारण उस कार्य में कुछ भी निर्माण नहीं हुआ।
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