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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘मुझको कोई ऐसा काम करना आता नहीं।’’
‘‘विचार तो करिये।’’
‘‘विचार क्या करूँ? मैं बम्बई यूनिवर्सिटी का ग्रेजुएट अवश्य हूँ, परन्तु मैं कोई काम करना नहीं जानता, जो इतना उपयोगी हो कि उसमें समाज को मेरी आवश्यकता पड़े।’’
सूसन समझ गई कि उसका पति समाज के उस अँग का सदस्य हैं, जो दूध पीने वाले मजनुओं का है। ये लोग समाज का कुछ भी भला नहीं कर सकते, परन्तु धन-संग्रह खूब करते हैं।
सूसन ने अपने गाँव में कम्यूनिस्टों को व्याख्यान देते हुए सुना था। वे पूँजीपतियों की निन्दा किया करते थे। वे इन लोगों को समाज की जोंक की उपाधि देते थे। आज उसको उनके कहने में तत्व प्रतीत हो रहा था।
इसपर भी उसने बिहारीलाल से उसके भाई की उन्नति की कथा सुनी थी। उसको भी वह पूँजीपति ही समझती थी, परन्तु वह उसके पति से सर्वथा भिन्न प्रकार का पूँजीपति था। उसके काम को वह उत्पादक कार्य मानती थी। बिहारीलाल के भाई ने भी पूँजी का प्रयोग किया था। इसपर भी उसका प्रयोग वैसा नहीं था, जैसा उसका पति, चैम्बर में रुपया जमा कराकर सोना खरीदने में करता था।
इसके पश्चात् सूसन को जब-जब भी अवसर मिलता, वह सुन्दरलाल को समझाने का यत्न करती कि उसका और उसके पिता का काम किसी भी प्रकार से समाज को लाभ नहीं पहुँचाता। इस कारण यह तो जोंक की भाँति समाज के अर्जित धन को चूसने के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
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