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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
इस सब प्रेरणा का कितना लाभ हो रहा था, कहा नहीं जा सकता। इस समय एक घटना घटी, जिसने सुन्दरलाल तथा सूसन के जीवन को भारी धक्का दिया।
एक दिन सुन्दरलाल को यह पता चला कि उसके पिता को सोने के सट्टे में इतनी हानि हुई है कि उनका दिवाला निकले बिना नहीं रहेगा। चैम्बर वालों ने बताया कि उसके पिता को बाजार का पाँच करोड़ रुपया देना हो गया है। सुन्दरलाल तो इस सूचना से भौंचक्का रह गया।
कुन्दनलाल को भी पता चला कि बिना बाजार का रुपया दिये वह काम नहीं कर सकता तो यह समझ कि दिवाला निकलेगा ही, उसने अपनी पत्नी को बुलाकर पूछा, ‘‘कितना रुपया तुम्हारे पास रखा है?’’
‘‘क्यों?’’
‘‘सोने के व्यापार में बहुत घाटा हो गया है।’’
‘‘मेरे पास तीन लाख के लगभग है।’’
‘‘अच्छी बात है। रुपया और सब आभूषण एकत्रित कर लो। इसको यहाँ से निकालना आवश्यक हो गया है। अन्यथा कोर्ट इसको भी ताला लगवा देगी। परिणाम यह होगा कि हमारे पास पहनने के कपड़े भी नहीं रह जायेंगे।
‘‘देखो रानी ! मैं अब कार्यालय में जा रहा हूँ। वहाँ से एक घंटे के भीतर टेलीफोन करूँगा और तुम सब रुपया और आभूषण लेकर दिल्ली चलने को तैयार रहना।’’
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