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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘इतना रुपया लेकर मैं अकेली कैसे जा सकूँगी?’’

‘‘यदि सुन्दरलाल पर विश्वास होता तो उसको साथ भेज देता, परन्तु उसको पता चला कि तुम्हारे पास इतना रुपया है, तो सब छीनकर अपनी रखैल के पास ले जायेगा।’’

‘‘तो फिर क्या करोगे?’’

‘‘देखो, तुम भूषणों और रुपयों को एक अटैची केस में बन्द करके रखो। मैं तुम्हारे साथ-चलूँगा। एक काम तुम करना, सुखिया चौकीदार को तैयार रखना। कदाचित् उसको साथ ले जाना पड़े।’’

सेठ कुन्दलाल अपनी पत्नी को समझा-बुझाकर कार्यालय में जा पहुँचा। वहाँ सुन्दरलाल चैम्बर में टेलीफोन कर रहा था। सुना कि उसके पिछले सप्ताह का हिसाब बना दिया जाये और रुपये का चेक भेज दिया जाये।

सुन्दरलाल ने टेलीफोन बन्द किया तो पिता ने पूछा, ‘‘कितना लाभ हुआ है तुमको?’’

‘‘पिछले सप्ताह में बीस हजार।’’

‘‘यह कैसे? तुमने माल खरीदा था अथवा बेचा था?’’

‘‘मैंने तो बेचा था।’’

‘‘परन्तु पांडे ने तो खरीदने की राय दी थी।’’

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