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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
सुन्दरलाल हँस पड़ा। उसने कहा, ‘‘पिताजी ! मैं तो कई महीने से देख रहा था कि पांड़े की गिनती में कुछ गलती हो रही थी। जब वह खरीदने को कहता था, तो मैं बेचता था और जब वह बेचने को कहता था तो मैं खरीदता था। यही कारण है कि पिछले छः मास से मैं लगातार लाभ में ही हूँ।’’
‘‘मैं पिछले छः मास से तो हानि ही उठा रहा हूँ। यदि तुम मुझको यह गिनती में गलती की बात बता देते, तो मैं भी बच जाता।’’
‘‘पर अब तो चैम्बर वाले आपको नोटिस दे रहे हैं।’’
‘‘क्या कह रहे हैं?’’
‘‘टेलीफोन आया था कि आपके नाम पाँछ-छः करोड़ रुपया हो गया है। इस कारण एक तो वे घाटे का रुपया तुरन्त चाहते हैं और दूसरे वे आगे व्यापार तबतक नहीं करने देंगे, जबतक नई जमानत जमा न हो जाये।’’
‘‘तो बात यहाँ तक हो गई है? अब दिवाला निकालना ही पड़ेगा। मैं इस बात की दर्ख्वास्त देकर हरिद्वार चला जाऊँगा और अपना शेष जीवन भगवत भजन में व्यतीत कर दूँगा।’’
‘‘दिवाला पिटने के पश्चात् तो भगवान् भी सहायक नहीं होगें।’’
‘‘यह मैं देख लूँगा। मेरे पास अभी इतना है कि मैं भगवान् को प्रसन्न कर लूँगा।’’
सुन्दरलाल हँस पड़ा। उसने पूछा, ‘‘कितना होगा आपके पास?’’
‘‘गिना तो नहीं। तुम्हारी माँ को कह आया हूँ कि सब बटोर कर दिल्ली जाने के लिए तैयार रहे।’’
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