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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘तो माँ अकेली जा रही है? आप तो अब जा नहीं सकेंगे। यदि आपने जाने का यत्न किया तो पुलिस गिरफ्तार तक लेगी।’’
‘‘मैं समझता हूँ कि सुखिया साथ जायेगा।’’
‘‘सुखिया चोर है। वह तो माँ का जीवन ही ले लेगा।’’
‘‘तो क्या करूँ? जीवन-भर में एक ही लड़का तो पैदा हुआ था; परन्तु वह अपनी रखैल के वश में है और विश्वास योग्य नहीं रहा।’’
‘‘यह तो पिताजी ! आप अन्याय कर रहे हैं। देखिए, मैंने आपसे एक पैसा भी नहीं लिया। माताजी के समझौता करा देने के पश्चात् मैंने आपको किसी प्रकार का धोखा नहीं दिया। आपको मुझपर भरोसा रखना चाहिए। यदि इस आड़े समय में, आपके काम मैं नहीं आऊँगा, तो धिक्कार है मुझपर।’’
इसपर कुन्दनलाल गम्भीर विचार में लीन हो गया। आखिर अन्य कोई मार्ग न पा बोला, ‘‘अच्छा, एक बात करो। तुम माँ के साथ जबलपुर चले जाओ।’’
‘‘और वहाँ सब सम्पत्ति उन चोरों के हाथ में दे दूँ। आपको इतना तो पता होना चाहिए कि वे अपनी बहनों और लड़कियों को लूट-लूटकर ही धनी हुए हैं। यदि कहीं माँ के भाई का दिल बेईमान हो गया तो एक कौड़ी भी नहीं मिलेगी।’’
‘‘तो फिर क्या करोगे?’’
‘‘एक बात हो सकती है। मैं माँ को सूसन के पास ले चलता हूँ। वहाँ सब रुपया गिनकर वह उसको सौंप आये। माँ यहाँ अपने घर में ही रहे। इससे लेनदारों को किसी प्रकार का सन्देह नहीं होगा कि उनको धोखा देने का यत्न किया गया है।’’
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