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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
सेठ कुन्दनलाल गम्भीर विचार में पड़ गया। कुछ विचार कर उसने सुन्दरलाल की आँखों में देखते हुए पूछा, ‘‘सुन्दर ! धोखा तो नहीं दोगे?’’
‘‘पिताजी ! आप निश्चिन्त रहें। इससे सुगम और सुरक्षित स्थान आपको और कोई नहीं मिल सकता। मैं आपसे पृथक् तो हो ही चुका हूँ। आपने सबको और कारखानों को लिखा ही हुआ है। चैम्बर में भी मेरा और आपका खाता पृथक-पृथक् है। ऐसी अवस्था में मेरे पास रखा धन सब प्रकार से सुरक्षित ही होगा।’’
सेठ कुन्दनलाल की समझ में बात आ गई। वह समझता था कि उसका साला, जो जब्बलपुर में रहता है, यदि बेईमान हो गया तो वह उसका कुछ भी नहीं कर सकेगा और यदि लड़का बेईमान हुआ, तो भी रोटी खाने को तो देगा ही। उसने यह विचार कर कहा, ‘‘ठहरो, तुम्हारी माँ को टेलीफोन कर समझा देता हूँ।’’
उसने टेलीफोन उठा, घर का नम्बर घुमा दिया और जब सुन्दरलाल की माँ सुनने लगी, तो उसने सुन्दरलाल की योजना, कि रुपया और आभूषण सूसन के पास जाकर रख दें, बता दी।
बहुत बातचीत के पश्चात् सुन्दरलाल की माँ मानी। पश्चात् सेठ कुन्दनलाल ने कहा, ‘‘सुन्दर तुम्हारे पास अपनी मोटर लेकर आ रहा है और बिना किसी नौकर को बताये, अटैची-केस लेकर उसके साथ चली जाओ और वहाँ पर सब कुछ गिन सूसन के हवाले कर दो।’’
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