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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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सूसन सुन्दरलाल को और उसके साथ अपनी सास को आते देख आश्चर्यचकित रह गई। सुन्दरलाल ने उसको सतर्क करने के लिए कह दिया, ‘‘डार्लिंग ! माँ आई है।’’
‘‘ओह !’’ सूसन ने हाथ जोड़कर नमस्कार की। वह अबतक भारतीय रीति-रिवाज को समझने लगी थी और अब भली-भाँति हिन्दुस्तानी बोलने भी लगी थी।
सुन्दरलाल की माँ ने उसकी पीठ पर हाथ फेरकर उसे आशीर्वाद दिया। अब सुन्दरलाल, जो अटैची-केस उठाये हुए समीप ही खड़ा था, बोला, ‘‘सूसन ! अपने सोने के कमरे में चलो, वही बात होगी।’’
भीतर कमरे में पहुँच, सुन्दरलाल ने सूटकेस पलंग पर रख दिया और सूसन को कहने लगा, ‘‘कागज-कलम लेकर लिख लो। माँ तुमको कुछ रखने के लिए दे रही है।’’
सूसन ने राइटिंग पैड लेकर पार्कर पैन से लिखना आरम्भ कर दिया। माँ ने सूटकेस खोलकर उसमें से वस्तुएँ निकाल-निकालकर लिखानी आरम्भ कर दीं।
सौ-सौ रुपये के तीन हजार नोटों के बंडल थे। सुन्दरलाल गिनता जाता था और सूसन लिखती जाती थी। आभूषण लिखाते-लिखाते सुन्दरलाल एक कंठी को देख ठहर गया और उसको ध्यान से देखने लगा। वह कंठी शकुन्तला की थी। उसके पैन्डल पर उसका नाम हीरे के टुकड़े में लिखा था। इससे उसको कुछ सन्देह हुआ तो उसने ध्यान से सब आभूषण देखने आरम्भ कर दिये। उसकी अपनी हीरे के नग वाली अँगूठी भी उनमें थी। यह अँगूठी उसको शकुन्तला के पिता ने विवाह के समय पहनाई थी। वे सब आभूषण जो उसकी तिजोरी में रखे थे, जिनके विषय में उसको बताया गया था कि उसकी अनुपस्थिति में शकुन्तला एक दिन चुपचाप आई थी और सब कुछ ले गई थी, इस अटैची-कैस में थे।
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