लोगों की राय

उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

270 पाठक हैं

बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


अब इन आभूषणों को देख सुन्दरलाल को विश्वास हो गया कि उसकी तिजोरी की, उसकी माँ ने चाबी लगाकर चोरी की है। शकुन्तला चोरी कराती तो आभूषण, जो उसके पिता ने दिये थे, अपनी सास के पास क्यों छोड़ जाती? उसने माँ के मुख की ओर देखकर पूछा, ‘‘माँ ! ये तो शकुन्तला के आभूषण हैं। तुम्हारे पास कैसे आ गये?’’

उसकी माँ की हँसी निकल गई। सुन्दरलाल तो और भी गम्भीर हो गया। इसपर माँ ने कहा, ‘‘जब तुम विलायत गये हुए थे, हम तुम्हारे दूसरे विवाह का निश्चय कर चुके थे। हमने यह विचार किया कि जब शकुन्तला को तुम्हारे नवीन विवाह का पता चलेगा, तो वह सब आभूषण और नकदी तिजोरी में से निकालकर ले जायेगी। इस कारण उसकी अनुपस्थिति में ही सब माल निकाल लिया था।’’

‘‘इसपर भी तुमने कहा कि शकुन्तला मेरी अनुपस्थिति में वहाँ आई थी और सबकुछ निकालकर ले गई है।’’

‘‘यह तो उसको बदनाम करते के लिए था, जिससे तुम उसको पुनः घर पर न ले जाओ।’’

‘‘कितना रुपया निकाला था?’’

‘‘अब ठीक स्मरण तो आ नहीं रहा। कुछ बीस-बीस हजार के लगभग था।’’

‘‘ठीक है। सूसन ! जितना रुपया तुमने लिखा है, उसमें से तीस हजार निकाल दो। साथ ही ये आभूषण निकाल कर पृथक् कर लो। ये शकुन्तला के हैं। शेष आभूषण माँ के हैं, माँ के नाम लिख लो।’’

इसपर माँ ने पूछा, ‘‘क्या उसके बार का दिवाला निकल रहा है?’’

सुन्दरलाल हँसकर चुप कर रहा।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book