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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


सेठ कुन्दनलाल ने दिवाले की प्रार्थना कर दी और कोर्ट ने तुरन्त उसकी सम्पत्ति पर रिसीवर बैठा दिया। इस प्रकार लेनदारों की सूची बनने लगी। लेनदारों में, करोड़ीमल उसका सबसे बड़ा लेनदार सिद्ध हुआ। कुन्दनलाल भी इस बात को देखकर चकित रह गया।

जिस दिन दिवाला स्वीकार हुआ, उसी दिन सोमनाथ सूसन को मार्केट में मिल गया। सूसन फल खरीद रही थी। सोमनाथ ने आगे आकर कहा, ‘‘गुड मार्निंग, मिसेज़ भगेरिया ! हाउ डू यू डू?

‘‘ओह ! आप यहाँ क्या कर रहे हैं?’’

‘‘ठीक वही, जो आप कर रही हैं। मैं कुछ फल लेने आया था। देखिये, आज मेरे गरीबखाने में दावत है और और विधिवत् निमन्त्रण मिस्टर एस० भगेरिया और मिसेज भगेरिया के नाम भेजा है। आप आकर गरीबखाने की रौनक बढ़ाएँगी, तो आभार मानूँगा।’’

‘‘क्या है आज, जो दावत दे रहे हैं?’’

‘‘तो निमन्त्रण-पत्र आपको नहीं मिला? मिस्टर भगेरिया को मैंने स्वयं दिया था।’’

‘‘नहीं मिला तो कुछ हानि नहीं हुई। पर है क्या?’’

‘‘एक मुकद्दमा जीता है और उसमें बहुत आया हुई है। विचार आया कि आये धन को बाँटकर खाया जाये।’’

‘‘किसका मुकद्दमा था?’’

‘‘सेठ करोड़ीमल का। उन्होंने मुझको इसमें दो लाख रुपया दिया है।’’

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