|
उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
|
270 पाठक हैं |
बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘चार करोड़ रुपये से ऊपर उसने ही लेना था।’’
‘‘ओह ! तभी वह कह रहा था कि करोड़ीमल ने चार करोड़ रुपये का मुकद्दमा जीता है और उसने जिताया है। इससे सेठजी ने उसको दो लाख रुपये से ऊपर दिये हैं और वह इस लाभ के रुपये को अपने मित्रों में बाँटकर खा रहा है।’’
‘‘मैंने पिताजी को कहा था कि यह बहुत बड़ा बेईमान है और वे उसका कहा ही मानते थे, परन्तु यह तो मुझको भी पता नहीं था कि पाण्डे इसके कहे अनुसार ही ज्योतिष लगा-लगाकर पिताजी का सर्वनाश कर रहा है। यह तो आज ही पता चला है।’’
‘‘कुछ भी हो। यह सट्टे का व्यापार बहुत ही गन्दा व्यापार है।’’
‘‘हम और कुछ तो कर ही नहीं सकते।’’
एकाएक सूसन को शकुन्तला के आभूषणों की बात स्मरण हो आई। उसने पूछा, ‘‘शकुन्तला के आभूषण इत्यादि कब उसको लौटाएँगे?’’
‘‘क्या जल्दी पड़ी है ! उसके पिता ने इन्हीं आभूषणों की चोरी के प्रतिकार में पिताजी को नष्ट कर दिया है।’’
‘‘यह कैसे?’’
‘‘वह यह रहा है कि कुन्दनलाल ने मेरी लड़की को घर से चोर बनाकर निकाला है, तो मैंने उसको उसके घर से दिवालिया बनाकर निकलवा दिया है।’’
सूसन इस रहस्योद्घाटन पर विस्मय में मुख देखती रह गई।
|
|||||

i 









