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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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जैसे जुए में, वैसे ही सट्टे में कमाई स्थिर नहीं रह सकती। कुछ जुआरी दूसरों से अधिक चतुर होते हैं और जब पाँसा उलटा पड़ने लगता है तो वे खेलना बन्द कर देते हैं। यही बात सुन्दरलाल में थी। इसपर भी फोकट में आई धन-सम्पदा फोकट में ही जाती है। सुन्दरलाल को एक और व्यसन लग गया था। वह था नाच-गाना देखने-सुनने का। बम्बई की एक विख्यात नर्तकी की मधुर आवाज और नाचते समय उसके अँगों का लचकाव देख-देख सुन्दरलाल उसपर मोहित हो गया था। परिणाम यह हुआ था कि वह होने नित्य ही घर पर देरी से आने लगा। इसपर सूसन को उससे निराशा होने लगी। उसने कई बार समझाया था कि सोने के समय तो घर पर आ जाना चाहिए, परन्तु सुन्दरलाल यह कहकर टाल दिया करता था, ‘‘तुम्हारे पास तो मोहन है, जो अपनी तोतली भाषा से तुम्हारा मन बहलाता रहता है। मुझको अपमा मन बहलाने से मना क्यों करती हो?’’
इसका परिणाम यह हो रहा था कि एक ओर सुन्दरलाल मद्यसेवन अधिक करने लगा था और दूसरी ओर घर से उसका सम्पर्क कम होने लगा था। परिणामस्वरूप सूसन को शकुन्तला से अधिक सम्पर्क बनाने का अवसर मिल रहा था। शकुन्तला से मिलने पर अथवा ललिता के बताने पर और बिहारीलाल के समझाने पर सूसन देवगढ़ में फकीरचन्द के काम से भली-भाँति परिचय पा चुकी थी।
वह अपने मन में कभी विचार करती थी कि वे भी क्यों नहीं फकीरचन्द की भाँति, कोई फार्म खोल सकते? इस प्रकार विचार करने पर उसके विचार एक दिन उसके मुख से निकल पड़े।
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