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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
उसने सुन्दरलाल को बिहारीलाल से सुने हुए विचार बता दिए। सुन्दरलाल रात बहुत देर करके और शराब में मदमस्त हो आया था और वह दिन के ग्यारह बजे तक बिस्तर पर करवटें लेता रहा था। सूसन उसके लिए चाय का प्याला लाई और चाय पिलाकर उसको सचेत करने लगी। सुन्दरलाल ने चाय पी और पलंग पर बैठा हुआ पूछने लगा, ‘‘कितने बज गये हैं?’’
‘‘विचित्र जीवन हो गया है आपका ! दिन-भर बिस्तर और घर में ही पड़े रहते हैं।’’
‘‘हाँ, और रात को गाने और नाच में डूबा रहता हूँ। इससे अच्छा जीवन और क्या हो सकता है?’’
‘‘देखिये, मैं इसको तो एक व्यर्थ का जीवन ही समझता हूँ। आप समाज के लिए कुछ करते नहीं और समाज से अर्जित धन की चोरी करते रहते हैं।’’
‘‘किसकी चोरी की है?’’
‘‘यह मैं क्या जानूँ? इतना जानती हूँ कि आपके पास जो कुछ भी है, उसके लिए आपने एक तिनका तक भी नहीं तोड़ा।’’
‘‘ओह ! यह फिर समाज का भूत सवार होने लगा है?
मुझको समाज से क्या मतलब? मैं हूँ, तुम हो और...और शराब है, नाच है, गाना है और किस बात की आवश्यकता है?’’
‘‘मैं चाहती हूँ कि जीवन में कुछ सृजनात्मक (क्रिएटिव) काम करना चाहिए। देखिए, सब सृजनात्मक कामों में मेहनत मुख्य है और पूँजी उसकी सहायक होती है। दूसरी ओर परिकल्पी कामों में मेहनत-मजदूरी को कुछ भी नहीं होती और पूँजी ही सबकुछ होती है। पूँजी का सदुपयोग तो तब ही समझा जाता है, जब इसका, मेहनत-मजदूरी के फल को कई गुणा अधिक करने में प्रयोग किया जाये। आपके पास पूँजी है, परन्तु आप उसको सृजनात्मक कामों में लगाना नहीं जानते। यही कारण है कि आप परिस्थितियों के आश्रम ही रह रहे हैं।
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