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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘आपकी स्थिति उस नाविक की भाँति है, जिसकी नाव पर न पाल है न पतवार। ऐसी नाव तो भगवान् के भरोसे ही रह सकती है। यदि वायु और लहरों के झोंकों से वह किनारे पर आ लगती है अथवा वेग की आँधी में सागर में डूब जाती है, तो इसमें न तो नाविक को श्रेय है, न ही अश्रेय।

‘‘मैं तो चाहती हूँ कि आप एक ऐसे जहाज़ पर सवार होकर सागर की यात्रा करें, जिस पर पाल हो, पतवार हो, डूबने से बचने के लिए रक्षा-पेटी (लाइफ बैल्ट) और रक्षा नौका (लाइफ बोट) हो। साथ ही जिसको चलाने के लिए एक प्रबल इन्जिन भी उसमें लगा हो।’’

‘‘सूसन डार्लिंग ! ये बहुत सुन्दर मनोद्गार हैं, परन्तु व्यावहारिक बात यह है कि इसके लिए धन चाहिए। यह प्रत्येक के भाग्य में नहीं कि वह ऐसे जहाज़ पर सवार हो, भव-सागर पार कर सके।’’

‘‘परन्तु कई लोग हैं, जिन्होंने ऐसे जहाज ‘स्क्रैप’ (क्षेप्य) से बना लिए है।’’

‘‘मुझको तो कोई ऐसा दिखाई नहीं देता। कम-से-कम भारत में तो कोई माई का लाल है नहीं।’’

‘‘एक के विषय में मैंने सुना है। यदि उसको चलकर देखा जाये और उसके ढँग का अध्ययन किया जाये, तो कैसा रहे?’’

‘‘कौन है वह?’’

‘‘बिहारीलाल का भाई। जो कुछ उसके विषय में सुना है, वह अति विस्मयजनक और चमत्कारिक प्रतीत हुआ है।’’

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