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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


सुना तो सुन्दरलाल ने भी था, परन्तु उसको विश्वास नहीं हो रहा था। कई मास से सट्टे का काम वह आजकल कर नहीं रहा था। जब-जब भी उसने इसमें हाथ डाला था, उसको हानि हुई थी। इस कारण वह अपने अच्छे समय की प्रतीक्षा में था। इसपर भी वह खुले हाथों से व्यय कर रहा था, आज उसको विचार आया कि क्या हानि है फकीरचन्द के विषय में जानकारी प्राप्त करने में? वह विचार करता था कि कदाचित् वह भी इस प्रकार का कुछ कर सके।

उसने पूछा, ‘‘सूसन ! तुम कहती तो ठीक हो; परन्तु मैं वहाँ जाऊँ कैसे और फिर वह मुझको बतायेगा ही क्यों? यदि कुछ बतायेगा, तो वह सब सत्य ही होगा, कैसे कहा जा सकता है?’’

‘‘देखिये, आपने एक बार बिहारीलाल को अपना मित्र कहा था। आप उससे मिलकर पहले यहीं पता करें। यदि बिहारीलाल अपने भाई को लिख दे, तो कोई कारण नहीं कि वह आपको गलत बात बताये।’’

‘‘पर बिहारीलाल क्यों मुझको चिट्ठी लिखकर देगा?’’

‘‘नहीं देगा तो कोई अन्य उपाय विचार कर लेगें।’’

‘‘तो तुम उसको बुला लो।’’

‘‘नहीं; मेरे कहने से वह नहीं आयेगा। आप उससे मिलकर, उसने पुनः सम्बन्ध पैदा कर लें और फिर उससे बातचीत कर लें।’’

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