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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
सुन्दरलाल ने, एक समय बिहारीलाल और सूसन पर अनुचित सम्बन्ध रखने का संदेह किया था। इस कारण अब वह उसको मिलकर, उससे सम्बन्ध बनाये, यह उसको विचित्र-सा प्रतीत होता था। इस कारण उसने सूसन को कहा, ‘‘मैं बिहारीलाल का पता तो कर सकता हूँ, परन्तु अब इतने काल के पश्चात् उससे मैत्री बनाना कुछ अच्छा प्रतीत नहीं होता।’’
‘‘इसमें वैचित्र्य ही क्या है? आप अपनी मोटर में, दो-चार दिन उसके होस्टल में आगे से निकल जाया करें। अवश्य भेंट हो जायेगी। फिर उसको बताइयेगा नहीं कि आप उससे मिलने के लिए उत्सुक है। बस बातचीत होने लगेगी। इस प्रकार दो-तीन बार मिले, तो आप सबकुछ जान जायेंगे। तत्पश्चात् उससे चिट्ठी लेकर देवगढ़ जाने का विचार कर लेंगे।’’
सुन्दरलाल को दिनभर कुछ काम तो रहता नहीं था। इस कारण उसी दिन से उसने मध्याह्न का भोजन कर, मोटर पर सवार हो बिहारीलाल के कॉलेज और होस्टल के चक्कर लगाने का निश्चय कर लिया।
पहले ही दिन तीसरे चक्कर में उसको बिहारीलाल अपने होस्टल से निकलता दिखाई दिया। सुन्दरलाल ने अपनी मोटर उसके समीप ले जाकर खड़ी कर दी। बिहारीलाल ने अपने साथ ही आकर खड़ी होती गाड़ी की ओर देखा तो उसमें सुन्दरलाल को देख, एक ओर होकर आगे बढ़ने लगा। इस पर सुन्दरलाल ने उसको आवाज दे दी, ‘‘बिहारीलाल जी ! रुष्ट हो गये हैं क्या?’’
एकाएक बिहारीलाल खड़ा हो, प्रश्नभरी दृष्टि से सुन्दरलाल की ओर देखने लगा। सुन्दरलाल गाड़ी से बाहर निकल आया और पूछने लगा, ‘‘किधर जा रहे हो?’’
‘‘आप मुझसे बात कर रहे हैं क्या?’’
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