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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘तुम बिहारीलाल नहीं हो क्या?’’
‘‘हूँ तो।’’
‘‘परन्तु आप कौन हैं?’’
‘‘ओह ! तुम जानते नहीं? मैं सुन्दरलाल हूँ। सुन्दरलाल भगेरिया।’’
‘‘अच्छा आप वही सुन्दरलाल हैं, जो सूसन के मित्र हैं?’’
‘‘मित्र नहीं, भई ! पति हूँ।’’
‘‘अच्छा? क्षमा करना। मुझे विवाह होने का पता नहीं चला। खैर, ऐसा होता ही है। हाँ, तो क्या आज्ञा हैं?’’
‘‘खैर ! पहिचाना तो सही। आप किधर जा रहे हैं? आज चित्त कुछ उदास है और अकस्मात् आप मिल गये हैं। एक बार पहले भी, एक ऐसे ही समय आपसे सहायता मिली थी। यदि किसी खास काम से न जा रहे हो, तो आइये, कहीं चाय पीयेंगे।’’
बिहारीलाल वास्तव में चाय पीने ही जा रहा था। आज शनिवार था और अपने स्वभावानुसार उसका किसी रैस्टोराँ में चाय लेने का विचार था। सुन्दरलाल से दो-चार स्पष्ट बातें करने के लालच में वह सुन्दरलाल की मोटर में बैठ गया। सुन्दरलाल ने गाड़ी चला दी और ‘फ्लैटीज़’ की ओर जाते हुए कहने लगा, ‘‘एक दिन मैं सूसन का परिचय एक मित्र से कराने के लिए परेशान था। मित्र कोई ऐसा मिल नहीं रहा था, जिसको मैं अपने से कम चतुर समझता। मुझको किसी के, सूसन को बरगला लेने का भय समा रहा था। एकाएक तुम करोड़ीमल के घर पर मिल गये और तुम्हें सीधा-सादा और सरलचित्त बालक मात्र समझ, अपना मित्र बनाकर सूसन के पास ले गया था।
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