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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘पीछे मुझको कुछ ऐसा प्रतीत हुआ कि तुम तो बहुत ही चतुर और योग्य व्यक्ति हो और सूसन का तुम्हारी ओर विशेष झुकाव देखकर मैं डर गया। इस बात को एक साल व्यतीत हो गया है। सूसन अब माँ हो गई है और इतने वर्षों में उसने कुछ ऐसा सिद्ध कर दिया है कि वह अति नेक औरत है। ऐसी अवस्था में आज अपने मन की खिन्न अवस्था में तुम्हें घूमने के लिए जाते देख, विचार आया कि पुनः पुरानी मित्रता क्यों न बना ली जाये? तुम्हारा क्या विचार है?’’
‘‘सच बताऊँ सुन्दरलाल जी !’’
‘‘हाँ, हाँ ! मुझको तुम्हारे विचार जानकर बहुत प्रसन्नता होगी।’’
‘‘तो सुनिये। मैं आपका न तो मित्र हूँ और न ही शत्रु। जैसे रेलगाड़ी में यात्रा करते हुए साथी यात्रियों से परिचय हो जाता है, वैसा ही आपसे परिचय हो गया था। सूसन को मैं सदा अपनी बहन मानता रहा हूँ। मुझको ऐसा विदित हुआ था कि आप समझते हैं कि मैं सूसन पर अनुचित डोरे डाल रहा हूँ। यह जानकर मुझको दुःख नहीं हुआ था। मैं तो केवल यह समझा था कि जैसे एक दुर्बल आदमी के हाथों में एक भारी निधि पड़ जाये और तब, जैसे वह इस निधि के खो जाने के भय से आशंकित रहता है, वैसी ही आपकी अवस्था है। मैं अनुभव करता था कि आप सूसन जैसी स्त्री के पति होने के योग्य नहीं। किन्हीं कारणों से वह आपके अधिकार में आ गई है और आपको सदा भय लगा रहता है कि कोई उसको चुराकर न ले जाये। इस कारण आपका, साधु आदमियों को चोर समझ लेना स्वाभाविक ही था। इसीलिए आपके चित्त को शान्ति प्रदान करने के लिए, मैंने सूसन से तटस्थ रहना ही उचित समझा।’’
‘‘तुम्हारा कहना सत्य है। इसी कारण आज मेरे मन में पुनः तुमसे सम्बन्ध बनाने का विचार उत्पन्न हो उठा है।’’
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