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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


बिहारीलाल बातचीत के बहाव के इस ओर जाने की आशा नहीं करता था। उसने सुन्दरलाल को, सूसन के योग्य होने पर सन्देह किया था, परन्तु सुन्दरलाल ने इसको बुरा नहीं माना। इससे उसको विस्मय हुआ। इस कारण उसने अपने कथन में कटुता निकालने के लिए कह दिया, ‘‘इसपर भी एक बात और है, जिससे मैं आपके सम्पर्क में कुछ अधिक आना नहीं चाहता था। आप धनी हैं और मैं एक निर्धन कृषक का भाई मात्र। हमारा समाज भिन्न-भिन्न है। हमारे विचार और व्यवहार में अन्तर है और हमारे जीवन के उद्देश्यों में भी समानता नहीं। मैं समझता था कि न तो मैं कभी आपको चाय इत्यादि पर निमन्त्रण दे सकता हूँ और न ही हम एक स्थान पर बैठ-कर एक ही भाषा और विषय पर बातचीत कर सकते हैं।’’

‘‘यह तो ठीक है; परन्तु कभी-कभी भिन्न विचार और भाषा बोलने वालों का मेल-जोल हो जाता है। इसमें वेरायटी (विविधता) होने से विशेषता आ जायेगी।’’

होटल में जाकर चाय पीते समय दोनों में अनेकानेक विषयों पर सिनेमा, थिएटर, यूरोपियन देशो के आचार-विचार और अपने देश के दर्शनीय स्थानों पर बातचीत होती रही। सुन्दर ने अपने उद्देश्य की ओर आज संकेत भी नहीं किया। एक घण्टाभर बातचीत के पश्चात् दोनों होटल से निकल आये और सुन्दरलाल उसको उसके होस्टल में छोड़ गया। जाने से पूर्व उसने कहा, ‘‘देखो बिहारीलाल ! पिताजी का दिवाला निकल चुका है। वे हरिद्वार चले गये हैं। आजकल व्यापार मे हलचल न होने से, मेरा काम न के बराबर है। इस कारण मैं दिनभर खाली रहता हूँ और मैं सत्य कहता हूँ कि तुम्हारे साथ यह एक घण्टा मेरे जीवन का अति मनोरंजन समय था। मैं समझता हूँ कि तुमसे मिलकर मुझको सदा प्रसन्नता होगी।’’ इतना कह सुन्दरलाल चला गया और बिहारीलाल इस मेल पर आश्चर्य करता हुआ मोटर जाती देखता रह गया।

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