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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।

6

इसके पश्चात् सुन्दरलाल और बिहारीलाल में कई बार भेंट हुई। आखिर एक दिन उसने बिहारीलाल को अपने घर पर मध्याह्न के भोजन का निमन्त्रण दे दिया। शनिवार था और नियमानुसार सुन्दरलाल बिहारीलाल के साथ ‘फ्लैटीज़’ में चाय ले रहा था। सुन्दरलाल ने पूछ लिया, ‘‘बिहारीलाल ! कल रविवार है। यदि कोई विशेष काम न हो, तो खाना हमारे यहाँ खा लो?’’

‘‘आपके घर? देख लीजिये। पीछे फिर विचार बदल गया तो बहुत ही भद्द होगी। मेरा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा। हाँ, बिचारी सूसन को बहुत ही दुःख होगा। जहाँ तक मैं समझता हूँ पिछली बार आपके मुझसे मेल-जोल रखने से मना करने पर उसको बहुत दुःख हुआ था।’’

‘‘एक बार भूल कर चुका हूँ। अब उसको दुहराने की आशा नहीं।’’

इस प्रकार बिहारीलाल सूसन के घर पर, उसके साथ भोजन करने के लिए आमन्त्रित हो रविवार को वहाँ जा पहुँचा। सूसन ने उठकर दोनों हाथों से उसके हाथ पकड़ उसका स्वागत किया और उसे डाईनिंग हॉल में ले जाकर बैठाया। इस दिन भोजन करते-करते देवगढ़ के फार्म के विषय में बातचीत होने लगी। जब बिहारीलाल वहाँ पर कार्य करने की विधि बता चुका, तो सुन्दरलाल ने प्रश्न किया, ‘‘सेठ करोड़ीमल इसमें सफल क्यों नहीं हुए?’’

‘‘इस कारण कि काम करने वाला कोई आदमी नहीं मिला। साथ ही जो कुछ भी लाभ हुआ था वह सेठजी ने अपने प्रयोग में ले लिया था। उसे उन्हें पुनः फार्म में ही लगा देना चाहिए था। इससे ही किसी कारोबार में उन्नति हो सकती है।’’

‘‘इस समय आपके भाई साहब की आय कितनी होगी?’’

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