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उपन्यास >> कर्मभूमि (उपन्यास) कर्मभूमि (उपन्यास)प्रेमचन्द
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प्रेमचन्द्र का आधुनिक उपन्यास…
सुखदा ने बात काटी–अच्छा, अब तुमने बातें बनाने की कला भी सीख़ ली। तुम्हारे हृदय का हाल कुछ मुझे भी मालूम है। उसमें नीचे से ऊपर तक क्रोध-ही-क्रोध है क्षमा या दया का कहीं नाम भी नहीं। मैं विलासिनी सही, पर उस अपराध का इतना कठोर दण्ड।
और यह जानते थे कि वह मेरा दोष नहीं, मेरे संस्कारों का दोष था।’
अमर ने लज्जित होकर कहा–‘यह तुम्हारा अन्याय है सुखदा!’
सुखदा ने उसकी ठोड़ी को ऊपर उठाते हुए कहा–‘मेरी ओर देखो। मेरा ही अन्याय है! तुम न्याय के पुतले हो? ठीक है। तुमने सैकड़ों पत्र भेजे, मैंने एक का भी जवाब न दिया, क्यों? मैं कहती हूँ, तुम्हें इतना क्रोध आया कैसे? आदमी को जानवरों से भी प्रीति हो जाती है। मैं तो फिर भी आदमी थी। रूठकर ऐसा भुला दिया मानो मैं मर गयी।’
अमर इस आक्षेप का कोई जवाब न दे सकने पर भी बोला–‘तुमने भी कोई पत्र नहीं लिखा और मैं लिखता भी तो तुम जवाब देती। दिल से कहना।’
‘तो तुम मुझे सबक देना चाहते थे?’
अमरकान्त ने जल्दी से आक्षेप को दूर किया–‘नहीं, यह बात नहीं है, सुखदा, हज़ारों बार इच्छा हुई कि तुम्हें पत्र लिखूँ, लेकिन...’
सुखदा ने वाक्य को पूरा किया–‘लेकिन भय यही था कि शायद मैं तुम्हारे पत्रों को हाथ न लगाती। अगर नारी-हृदय का तुम्हें यही ज्ञान है, तो मैं कहूँगी, तुमने उसे बिलकुल नहीं समझा।’
अमर ने अपनी हार स्वीकार की–‘तो मैंने यह दावा कब किया था कि मैं नारी हृदय का पारखी हूँ?’
वह यह दावा न करे; लेकिन सुखदा ने तो धारणा कर ली थी कि उसे यह दावा है। मीठे तिरस्कार के स्वर में बोली–‘पुरुष की बहादुरी तो इसमें नहीं है कि स्त्री को अपने पैरों पर गिराये। मैंने अगर तुम्हें पत्र न लिखा, तो इसका यह कारण था कि मैं समझती थी,
तुमने मेरे साथ अन्याय किया है, मेरा अपमान किया है, लेकिन इन बातों को जाने दो। यह बताओ, जीत किसकी हुई, मेरी या तुम्हारी?’
अमर ने कहा–‘मेरी या तुम्हारी?’
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