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उपन्यास >> कर्मभूमि (उपन्यास) कर्मभूमि (उपन्यास)प्रेमचन्द
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प्रेमचन्द्र का आधुनिक उपन्यास…
अमर ने कहा–‘मेरी।’
‘और मैं कहती हूँ–मेरी।’
‘कैसे?’
‘तुमने विद्रोह किया था. मैंने दमन से ठीक कर दिया।’
‘नहीं तुमने मेरी माँगें पूरी कर दीं।’
उसी वक़्त सेठ धनीराम जेल के अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ अन्दर दाखिल हुए। लोग कुतूहल से उन लोगों की ओर देखने लगे। सेठ इतने दुबले हो गये थे कि ब़ड़ी मुश्किल से लकड़ी के सहारे चल रहे थे। पग-पग पर खाँसते भी जाते थे।
अमर ने आगे बढ़कर सेठजी को प्रमाण किया। उन्हें देखते ही उसके मन में उनकी ओर से जो गुबार था, वह जैसे धुल गया।
सेठजी ने उसे आशीर्वाद देकर कहा–‘मुझे यहाँ देखकर तुम्हें आश्चर्य हो रहा होगा बेटा, तुम समझते होगे, बुड्ढ़ा अभी तक जीता जा रहा है, इसे मौत क्यों नहीं आती? यह मेरा दुर्भाग्य है कि मुझे संसार ने सदा अविश्वास की आँखों से देखा। मैंने जो कुछ किया, उस पर स्वार्थ का आक्षेप लगा। मुझमें भी कुछ सच्चाई है, कुछ मनुष्यता है, इसे किसी ने कभी स्वीकार नहीं किया। संसार की आँखों में मैं कोरा पशु हूँ, इसलिए कि मैं समझता हूँ, हरेक काम का समय होता है। कच्चा फल पाल में डाल देने से पकता नहीं। तभी पकता है, जब पकने के लायक हो जाता है। जब मैं अपने चारों ओर फैले हुए अन्धकार को देखता हूँ, तो मुझे सूर्योदय के सिवाय उसके हटाने का कोई दूसरा उपाय नहीं सूझता। किसी दफ्तर में जाओ, बिना रिश्वत के काम नहीं चल सकता। किसी घर में जाओ, वहाँ द्वेष का राज्य देखोगे। स्वार्थ, अज्ञान, आलस्य ने हमें जकड़ रखा है। इसे ईश्वर की इच्छा ही दूर कर सकती है। हम अपनी पुरानी संस्कृति को भूल बैठे हैं। वह आत्मप्रधान संस्कृति थी। जब तक ईश्वर की दया न होगी, उसका पुनर्विकास न होगा और जब तक उसका पुनर्विकास न होगा, हम लोग कुछ नहीं कर सकते। इस प्रकार के आन्दोलन में मेरा विश्वास नहीं है। इनसे प्रेम की जगह द्वेष बढ़ता है। जब तक रोग का ठीक निदान न होगा, उसकी ठीक औषधि न होगी, केवल बाहरी टीम-टाम से रोग का नाश न होगा।’
अमर ने इस प्रलाप पर उपेक्षा–भाव से मुस्कराकर कहा–‘तो फिर हम लोग उस शुभ समय के इन्तज़ार में हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहें?’
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